चेहरे पर मुस्कान छाया
कानों ने जब सुना चाचा
तेरे नाम का डाकिया डाक लाया ।
सुनकर मन प्रफुल्लित हुआ
एक पिता का कठोर ह्रदय भी
पिघलकर माॅं समान हुआ ।
ऑंखों में ऑंसू छलक आए
अपने ऑंसूओं को छलकने से रोककर
दौड़ते हुए वह डाकिया के पास आया ।
मेरे बेटे की चिट्ठी आई है कहते हुए
आशाएं और उम्मीदों भरी बूढ़ी
ऑंखो ने डाकिया की तरफ
अपने हाथ को बढ़ाया ।
तुम्हारे नाम की डाक नहीं मैं लाया
जाकर अपनी बहूरिया को लाओं
उसी के नाम का खत तो मैं लाया ।
बहुरिया को मैं दे दूंगा
कहते हुए बूढ़े पिता ने
डाकिया की तरफ फिर से
अपना दाहिना हाथ बढ़ाया ।
जिसके नाम की रजिस्ट्री आई है
उसी को ही मैं दूंगा
तेरे लिए यह खत नहीं
इतनी सी बात भी
तेरी समझ में ना आया ।
डाकिया की बातें बहुरिया भी सुन रही
लोक लाज छोड़ दौड़ते हुए आई वों
पति का खत लें मुस्कुराई वों ।
डाकिया अपनी साइकिल के पास
खड़ा सोचने लगा
तीन महीने पहले तक
जिस पिता के हाथों में
उसके बेटे की चिट्ठियां देता मैं रहा
आज उसी के बढ़े हाथ खाली देखकर
मेरा मन बेचैन क्यों हो रहा ?।
शादी के बाद पता तो वही रहा
इसके बेटे की चिट्ठी में
नाम ही बदल गया
एक और खत इसका बेटा
अपने पिता के नाम लिख लेता
कुछ समय तो लगता लेकिन
इस बूढ़े पिता का
कलेजा तो ना फटता ।
डाकिया बाबू ने गांव की चौपाल पर
जाकर अपनी साइकिल रोकी
अंतर्देशीय खत में एक पिता और
माता के लिए कुशल क्षेम लिखी ।
पहुंच गया फिर से उसी बुढ़ी ऑंखों के
बिखरे उम्मीदों को जगाने
जिसके नाम का खत था
उसके चेहरे पर बड़ी सी
मुस्कान देखकर डाकिया बाबू के
खुद के चेहरे पर भी मुस्कान आया ।
डाकिया बाबू ने खाकी का
अपना झोला उठाया
साइकिल पर सवार
अपने फर्ज के साथ – साथ
किसी और भी बूढ़ी ऑंखों की
रोशनी कभी भी ना कमजोर हो
इस ओर उसने अपना कदम बढ़ाया ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻गुॅंजन कमल 💗💞💓
