जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,
अख़बार की सुर्खियों में:–
नेताओं की हर खबर,
अखबार की सुर्खियों में,
याद न आते कभी वो दिन,
जब खड़े रहते जोड़ के दोनों हाथ!!
जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,
अखबार की सुर्खियों में:–
लूट खसोट का गोरखधंधा,
अखबार की सुर्खियों में,
राशन की जब तब बंद दुकानें,
नज़र नहीं आतीं खाली गरीब के हाथ!!
जरा गौर फरमायें, इधर भी,
अखबार की सुर्खियों में:–
चोरी डकेती और नकबजनी,
अखबार की सुर्खियों में,
हर गली मुहल्ले चौराहों में,
क्यों रहते पुलिस के खाली हाथ!!
जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,
अखबार की सुर्खियों में:–
लुटती इज्ज़त होते बलात्कार,
अखबार की सुर्खियों में,
अपने ही देश में नहीं सुरक्षित,
क्यों रहता शासन मौन खाली हाथ!!
जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,
अखबार की सुर्खियों में:–
होतीं अपराधिक गतिविधियां,
अखबार की सुर्खियों में,
उठाया न जाता कड़ा कदम,
क्यों जिम्मेदारों के बँधे खाली हाथ!!
जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,
अखबार की सुर्खियों में ।
रचनाकार -रजनी कटारे
जबलपुर (म. प्र.)
