शहर की मानसिक रोगशाला में एक पागल स्त्री अनेकों वर्षों से रह रही थी। इस समय भले ही प्रोणावस्था के कारण उसका रूप कुछ मलिन हो चुका था , पर कोई भी अंदाजा लगा सकता था कि अपनी युवावस्था में वह अनुपम सुंदरी रही होगी। अपनी बड़ी बड़ी आंखों से युवकों को घायल करने में इसे देर न लगती होगी। विधि का विधान कि किसी राजमहल की स्वामिनी जैसी लगती स्त्री एक पागलखाने में जीवन बिता रही थी। 
   भले ही ऊपरी तौर पर वह पागल जैसी नहीं लगती। उसके बातों का अंदाज भी किसी पागल से अलग है। पर निश्चित ही उसके पागल होने के कारण ही तो वह यहाँ रह रही है। अन्यथा यदि वह स्वस्थ होती तो अपने घर वापस जाने की मांग करती। अपने पति और परिवार की याद करती।
   पता नहीं क्या रहस्य है। वह अपने रिश्तों से क्यों निर्मोही बन गयी है। अथवा कहीं अपने उपचार के आरंभ में प्रयुक्त विद्युत झटकों के कारण वह अपनी वह स्मृति भी भूल चुकी है जो कि उसे भुलनी नहीं चाहिये।
  हालांकि आजकल मानसिक रोगी के उपचार के अनेकों नये तरीके जन्म ले चुके हैं। पर पृथम दृष्टया यही माना जाता है कि मस्तिष्क पर जब कोई बात अपना गहरा असर छोड़ जाती है, उस समय व्यक्ति अजीबोगरीब व्यवहार करने लगता है। प्रेम में असफलता, किसी प्रिय का विहोह, अचानक अर्श से फर्श पर आ जाना, अत्यधिक अपमान और भी न जाने ऐसे कितने कारण होते हैं कि व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो जाये। फिर उन कड़बी यादों को मिटाने के लिये मानसिक चिकित्सकों द्वारा ऐसा इलाज भी किया जाता है जो कि मानवता के मापदंड में कहीं भी सही नहीं कहलाता। अनेकों बार उस इलाज के कारण व्यक्ति अपनी सही याददाश्त भी भूल जाता है।
  मोह एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है। जीवन भी आगे बढने का नाम है। सही कहा जाये तो ऐसे रोगियों के परिजन भी अक्सर उनसे दूरी बनाने लगते हैं। मानसिक चिकित्सालय में अनेकों रोगियों को उनके परिजन देखने भी नहीं आते। ऐसे ही अभागे मरीजों में एक वह स्वयं थी। 
  इतने बीच में अनेकों चिकित्सक आये और स्थानांतरित होकर चले गये। आज तक कभी भी किसी ने कुछ अलग नहीं सोचा था। पर अनेकों बार कुछ अलग सोचने बाले चिकित्सक भी आ जाते हैं।
   राहुल एक युवा चिकित्सक हैं। मानसिक रोगियों के प्रति उन्होंने प्रेम तथा सहानुभूति द्वारा अभूतपूर्व सफलता पायी थी। इस चिकित्सालय में भी उन्हें आये कुछ ही वर्ष हुए हैं। इतने कम समय में अनेकों मानसिक रोगी स्वस्थ होकर अपने घर जा चुके हैं। पुराने रिकार्ड निकाल वह स्वस्थ होते परिजनों से संपर्क करते हैं। अपने परिजनों के साथ रहकर मरीज और भी जल्द स्वस्थ होने लगते हैं।
  पर अद्भुत था कि अनेकों बार सूचना देने पर भी उस पागल स्त्री का पति उसे लेने नहीं आया। वह यह मानने को तैयार नहीं कि उसकी स्त्री स्वस्थ हो सकती है। अजीब बात कि वह स्त्री भी कोई ऐसा संकेत न देती कि उसे अपने घर या परिवार का कुछ भी स्मरण है।
   यथार्थ और कल्पना में उस पागल स्त्री का केस झूल रहा था। डाक्टर राहुल मान रहे थे कि अपने परिजनों के मध्य रहकर वह स्त्री जल्द स्वस्थ होगी। पर स्त्री के पूर्ण स्वस्थ होने का उनके पास कोई प्रमाण न था।
    संभावना अनेकों थीं। ऐसे विषय में किसी को बाध्य भी नहीं किया जा सकता है। पर अब डाक्टर राहुल को कुछ अलग संभावना लगने लगी। लगने लगा कि शायद वह स्त्री कभी पागल ही न थी। उसे जानबूझकर पागल सिद्ध किया गया है। जानबूझकर उसे घर और परिवार से दूर रखा गया है। हालांकि ऐसा केवल मन में ही विचार किया जा सकता था। ऐसा मत व्यक्त करने का अर्थ पूर्ववर्ती डाक्टर पर आरोप लगाना था। बिना किसी पूर्ण प्रमाण के ऐसा संभव नहीं था।
  अनेकों वर्षों पूर्व जब वह स्त्री मानसिक चिकित्सालय में भर्ती की गयी थी, उस समय के डाक्टर ने उसे किन परिस्थितियों में मानसिक रोगी माना था। किन परिस्थितियों में माना था कि वह स्त्री समाज के साथ नहीं रह सकती है। उसके चिकित्सा रिकोर्ड में उल्लेखित उसे किन परिस्थितियों में विद्युत झटके दिये गये थे। आज इन बातों का सही सही पता कर पाना असंभव है। संभव है कि उस समय उस स्त्री की स्थिति ही ऐसी रही हो। तभी तो उस समय के डाक्टर ने ऐसे निर्णय लिये होगें। पर यह निश्चित था कि वर्तमान परिस्थितियों में वह समाज के लिये घातक तो नहीं है।
    भले ही वह पागल स्त्री अपने घर की याद न करती हो, भले ही उसका पति उसे अपने साथ रखने के लिये तैयार न हो पर एक सत्य यह भी था कि अब उस स्त्री का मामला पुलिस के भी संज्ञान में था। हालांकि बिना किसी प्रमाण के पुलिस भी कोई एक्शन नहीं ले सकती थी। केवल डाक्टर राहुल की आशंका मात्र से किसी आपराधिक गतिविधि को स्वीकार नहीं किया जा सकता था। तथा डाक्टर राहुल भी नहीं चाहते थे कि बिना किसी ठोस प्रमाण के उनका नाम सामने आये। हालांकि इस समय वह उस स्त्री के पति को बार बार संपर्क जरूर कर रहे थे। उसे आश्वस्त करने का प्रयास कर रहे थे कि अब उनकी स्त्री स्वस्थ है। उसे आराम से अपने साथ रख सकते हैं। आप उन्हें बीच बीच में जांच कराने ला सकते हैं। अपरिहार्य परिस्थितियों में आप चिकित्सालय की आपातकालीन सेवाओं पर सूचना दे सकते हैं। परिवार और परिजनों का साथ मानसिक रूप से स्वस्थ रोगियों को जल्द ठीक करता है।
   पर डाक्टर राहुल के बार बार समझाने के बाद भी उस स्त्री का पति उसे लेने नहीं आया, जो कि किसी गहरे षड्यंत्र का ही सूचक है। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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