जिस संपत्ति की चाह में मनुष्य कोई भी अधर्म करने से नहीं चूकता, वह संपत्ति क्या उसके काम आती है। क्या उसे वह सुख दे पाती है। पागलखाने में वर्षों से रहती आयी स्त्री यही सोचती थी। अपनी पुरानी सोच पर अफसोस करती थी। पागल न होने पर वह स्त्री पागल होने का दंश भोग रही थी। हालांकि वह खुद कह सकती थी कि वह पागल नहीं है। वह साजिश का शिकार हुई है। उसकी अधर्म से अर्जित संपत्ति पर कोई और आनंद ले रहा है। पर शायद अब वह विश्वास करना भूल चुकी थी।
वह याद कर रही थी, उन दिनों को जबकि उसके पति ने उसे मानसिक रोगी सिद्ध कर पागलखाने में दाखिल किया था। वह संबंधित डाक्टर को सत्य बता रही थी। पर डाक्टर ने उसकी एक न सुनी। इलाज के नाम पर अनेकों पीड़ा दायक स्थितियों को उसने झेला।
क्या उस समय का संबंधित डाक्टर समझने में भूल कर गया था। लगता तो ऐसा ही है। वह भी यही सोचती थी। पर एक दिन जब उसने संबंधित डाक्टर को उसके पति से भारी रकम लेते देख लिया तब समझ गयी कि सब पैसे से खरीदे हुए हैं।
आखिर इसमें गलत भी क्या है। वह भी यही करती आयी थी। पहले अपनी रूप माधुरी से धनियों को रिझाती थी। फिर उन्हें ब्लैकमेल कर धन अर्जित करती थी। धन की बदोलत अनेकों को खरीदती रही थी।
उसका विवाह भी क्या विवाह था। सत्य तो धन से खरीदा गया पति कब पति होता है। मौका मिलते ही पति बदल गया। अथवा शायद वह आरंभ से ही यही चाहता था।
फिर वह कभी विश्वास न कर पायी। बेतहाशा दर्द से बचने के लिये चुपचाप पागल बन रहती आयी। अनेकों चिकित्सक आये और गये। उसे अनेकों बार लगा कि उसे सही बात नये चिकित्सक को बतानी चाहिये। पर बता न सकी। यदि नया चिकित्सक भी बिक गया तो एक बार फिर से पागलपन के इलाज के नाम पर असहनीय दर्द भोगना होगा।
उस स्त्री ने डाक्टर राहुल पर भी भरोसा नहीं किया। पर जो किसी पर भरोसा नहीं करते हैं, वे भी किसी पर भरोसा कर जाते हैं। किसी को देख वह भी मान लेते हैं कि पूरी दुनिया बिकाऊ नहीं है। जो खुद धोखा देने में, अधर्म का आचरण करने में विश्वास करते आये हैं, वे भी सच्चे और ईमानदार लोगों पर विश्वास करने लगते हैं।
कभी प्रेम पर अपने रूप का जाल बिछाकर उसके और सरस्वती के जीवन में अनेकों कांटे बोने बाली महिमा, अनेकों वर्षों से पागलखाने में रह रही थी। उसने प्रेम को धोखा देकर जो अपार संपत्ति कमायी थी, उसपर उसका पति आनंद ले रहा था। हालांकि उसने दूसरा विवाह तो नहीं किया था पर सत्य यही है कि जीवन को कर्तव्यों के स्थान पर मौज मस्ती का पर्याय मानने बाले मौज मस्ती के अनेकों तरीके जानते हैं।
जीवन के कितने वर्ष महिमा ने इस पागलखाने में गुजारे। उसने अधर्म से जो संपत्ति अर्जित की थी, उसका कोई भी फायदा नहीं पाया। दूसरी तरफ उसका पति भी मौज मस्ती के ऐसे भंवर में पड़ा कि वह संपत्ति पानी की भांति बहती रही। अब जबकि अधिकांश संपत्ति नष्टप्राय थी, अकर्मण्यता की राह पर चलते रहे महिमा का पति भी कुछ असाध्य रोगों की चपेट में आ चुका था। जिनका सही इलाज करा पाना भी उसके लिये अंसभव बन रहा था।
डाक्टर राहुल के बार बार अनुरोध पर पुलिस के अधिकारी पागलखाने आये। संदिग्ध लगने पर फिर संध्या भी आयी। संध्या तो महिमा को पहचान न पायी पर महिमा ने संध्या को पहचान लिया। उससे भी बड़ी बात कि उसने संध्या पर विश्वास किया। फिर पर्दाफाश हुआ एक अनोखी साजिश का जिसमें संपत्ति के लोभ में पति ने ही अपनी पत्नी को पागल सिद्ध कर दिया था। उस काल के चिकित्सक की भूमिका भी सामने आयी।
महिमा के पति को उसके कृत्यों के लिये दस वर्ष की जेल हुई। चिकित्सक को भी सात वर्ष की जेल हुई। महिमा द्वारा प्रेम को ब्लेकमेल कर धन ऐंठने की स्वीकृति के कारण उसे भी दो वर्षों की जेल हुई।
महिमा का पति जेल से अपनी सजा पूरी कर कभी वापस नहीं आ पाया। जेल में भी उसका काफी समय असाध्य रोगों के इलाज के लिये सरकारी अस्पताल में बीता। महिमा की सजा पूरी होने से पूर्व ही वह दुनिया छोड़ गया।
दो वर्ष की सजा पूरी कर जब महिमा बाहर आयी, वह खाली हाथ थी। जीवन के ढलान के साथ ही उसका रूप उसका साथ छोड़ चुका था। तथा अपने रूप को हथियार बनाकर अर्जित अधर्म की संपत्ति भी उसे अपार कष्ट देकर नष्ट हो गयी।
वह समय जबकि किसी को सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, महिमा बिलकुल बेसहारा हो गयी। या तो समय की आवश्यकता थी अथवा कुछ पूर्व जन्मों के पुण्यों का उदय हुआ था, अपने रूप पर इतराने बाली महिमा वृन्दावन के एक महिला आश्रम में रहने लगी। एक मंदिर की नित्य साफ सफाई कर दोनों वक्त उसी मंदिर के भंडारे में प्रसादी भोजन पाने लगी।
अंत समय किये गये कर्म किसी के भी जीवन को नयी दिशा दे देते हैं। हालांकि महिमा का मन पूरी तरह शुद्ध हुआ है, इसपर विश्वास करना कठिन है। विश्वास तो यही किया जायेगा कि असहायता की स्थिति में उसके पास कोई अन्य राह भी नहीं है। पर एक विश्वास यह भी किया जाना आवश्यक है कि अंत समय में भी भगवान श्री कृष्ण के चरणो की सेवा में खुद को लगाने बाली महिमा की परलोक में तो दुर्गति नहीं होगी।
विश्वास किया जा सकता है कि मनुष्य अपने कर्मों से ही अपना भविष्य बनाता है। अपने कर्मो से ही उत्थान और पतन को प्राप्त होता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
