आज अंग्रेजी नववर्ष का पहला दिन है। निश्चित ही अनेकों पाश्चात्य परंपरा हमारे जीवन में इस तरह घुल मिल गयी हैं कि अब उनमें कुछ भी पाश्चात्य नहीं रह गया है। पाश्चात्य पंचांग भी उन्हीं में से एक है। जिस की सबसे अच्छी विशेषता है – सरलता। सरलता के कारण यह पंचांग आज सभी भारतीयों के मन की गहराई तक उतर चुका है।
  सामान्य धारणा यही है कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा है। लगता है कि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में हमारी भारतीय संस्कृति अपना अस्तित्व ही खोने जा रही है। लगता है कि आज भारतीयों की अवनति का कारण ही पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण है। अन्यथा हमारी प्राचीन संस्कृति की एक बड़ी गौरव गाथा रही है। भारत हमेशा विश्व गुरु रहा है। साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, गणित, चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में भारतीयों का डंका पूरे विश्व में बजा करता था। कहा तो यह भी जा सकता है कि विश्व को सोचने समझने की शक्ति ही भारत ने दी थी। जिस पृथ्वी गोल है तथा पृथ्वी ही सूरज का चक्कर लगाती है, जैसे सिद्धांतों को बोलने के कारण गेलीलियो को मृत्युदंड दिया गया था, वास्तव में ये सिद्धांत भारतीय वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने गेलीलियो से बहुत पहले ही दे दिये थे।
   मुझे लगता है कि विवेचना कभी भी एकपक्षीय नहीं होती है। मुझे यह भी लगता है कि भले ही पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण उचित नहीं है पर भारतीय संस्कृति की गौरव गाथा को अक्षुण्ण रखने में पाश्चात्य संस्कृति का भी हाथ रहा है। 
  भारतीय संस्कृति को मुख्यतः आर्य और द्रविड़ दो भागों में बांटा गया है। माना तो यह भी जाता है कि संभवतः आर्य संस्कृति खुद पाश्चात्य संस्कृति थी। जिसका मूल जर्मनी अथवा उसके आसपास की जगह रही होगी। हालांकि आर्यों को भारतीय संस्कृति का ही मूल मानने बाले विद्वानों की भी कमी नहीं है। 
  आर्य भारतीय संस्कृति है अथवा पाश्चात्य, इस विषय में मतभेद हो सकते हैं। पर यह निर्विवाद सत्य है कि आर्य भारत में इस तरह घुल मिल गये कि अधिकांश भारतीय संस्कृति के उत्थान का आधार भी आर्य ही रहे हैं। 
  निश्चित ही उस काल में भी आर्यों के अतिरिक्त भी अन्य संबृद्धशाली संस्कृति भी थीं। इतिहासकारों के अनुसार यवन, रोम की संस्कृति भी भारतीय संस्कृति के बराबर ही प्राचीन रही है। तथा ये सारी संस्कृति आपस में मिली हुई थीं। 
  विभिन्न भारतीय ग्रंथों में यवन, शक, हूणों को म्लेच्छ के रूप में बताया गया है। गार्गी याज्ञवल्क्य संवाद के अंतर्गत भी यवनों का उल्लेख हुआ है। जबकि परम विदुषी गार्गी यवनों को म्लेच्छ न मान ऋषि तुल्य बताती हैं। यवनों को गणित का विद्वान तथा ज्यामिति का खोजकर्ता बताती हैं। भारतीय मंदिरों के निर्माण तथा यज्ञ वेदियों के निर्माण में प्रयुक्त ज्यामिति के कारण यवनों को विशेष सम्मान अर्पित करती हैं।
  स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति पर यवन संस्कृति का पर्याप्त प्रभाव रहा है। तथा भारतीय संस्कृति के उत्थान में यवनों की भूमिका रही है।
   वर्तमान मंदिरों के शिखर का गुंबदाकार निर्माण भी एक उदाहरण है जबकि भारतीयों ने पाश्चात्य प्रयोग को अपने धर्म मे अपनाया। धर्म स्थलों के शिखर का गुंबदाकार निर्माण पश्चिम से ही भारत में आया था। तथा इस निर्माण के पीछे वैज्ञानिक आधार को देखते हुए इसे भारतीय संस्कृति में जगह दी गयी थी। 
  पश्चिम के देशों में आरंभ हुई कृषाणु संस्कृति भारत में आकर भारतीय संस्कृति में ही मिल गयी। कृषाणु वंश का शासक कनिष्क बोद्व धर्म का अनुयायी बन गया।
   भारतीयों को भारतीय संस्कृति पर गर्व करना एकदम उचित है। पर एक सत्य यह भी है कि खुद भारतीय अपनी संस्कृति के गौरव को भूल चुके थे। वेदों से भारतीयों का पुनः परिचय मेकुलम, कीथ तथा और भी दूसरे पाश्चात्य विद्वानों ने कराया। संस्कृत भाषा के अनेकों ग्रंथों की खोज भी पाश्चात्य विद्वानों ने की। भारतीय संस्कृति की प्रभुता का परिचय पूरे विश्व में पाश्चात्य विद्वानों ने ही कराया। अनेकों वैज्ञानिक खोज जो कि भारतीय संस्कृति का गौरव थीं, उन्हें पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने सहेजकर संसार के सामने रखा। उन खोजों में भारतीयों के योगदान को भी स्वीकार किया।
   भारतीय संस्कृति में उत्थान में पाश्चात्य संस्कृति का प्रमुख योगदान यही है कि पाश्चात्य संस्कृति ने ही भारतीयों को उनकी गौरवशाली संस्कृति का बार बार स्मरण कराया। अंधानुकरण किसी का भी उचित नहीं है। अनेकों बातों में बदलाव होता रहता है। समय समय पर विभिन्न मान्यताओं, वेषभूषा में भी बदलाव होता रहा है।
  भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता सभी की अच्छाई को खुद में समा लेना तथा समय के हिसाब से अनुचित हो रही मान्यताओं का परित्याग करना ही है।
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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