कोहरे की रात भयानक होती है
चलते पथ पर 2 गज का दृश्य देख नही हम पाते हैं ।
वाणी के शब्द भी कुछ दूर जाते घबराते हैं .. वाणी छन छन कर कोहरे की बूंदों से
व्योम शून्य बन जाती है ।
सड़कों पर चलने से हमको
भय रहता है टक्कर का
रस्ता भूल भटक जाते हैं हम
जाना होता है धर्मशाला
पर पहुंच जाते हाला प्याला ।
अ सर्द रात तेरे कुहरे मे
मै भूल गया घर का दरवाजा दारु नहीं पी कभी जीवन में पर नसा हुआ कोहरे का कैसा
देवेंद्र कुमार दिवाकर
बिजनौर उत्तर प्रदेश
