आये है दिनकर,
सुबह की सौगात लेके।
चल रही ठंडी पवन,
पंक्षियो की बात लेके।
अश्व सातों खूबसूरत,
प्रभा भी ये विशेष।
रात्रि का तम भी हरेगा,
और हिय का कलेश।
भवँर भी फूलों का रस,
पीने को व्याकुल।
हँस रहे चकवा चकई,
प्रेम में होकर के आतुर।
प्रात की ही बात है,
आलस्य सारा खो गया।
अपनी ही हर गतिविधि में,
संसार सारा हो गया।
आये है ये भास्कर,
अब इन्हें प्रणाम कर लो।
है सुहानी ये सुबह इसको,
नयनों में तो भर लो।
कोहरे की रात जैसे
हो गई विदा हो।
फैल गया जग में
प्रकाश ये नया हो।
इंदु विवेक उदैनियाँ
