सिंधुताई सपकाल
माँ ने नाम रखा था चिन्दी।
खुद का नाम रखा सिन्धु।।
सिन्धु की तरह विशाल।
जीवन की मुश्किल न सकी टाल।।
जब अपनों ने नाता तोड़ा।
अनाथों को गले लगाया।।
कदम बढ़ा मानवता की राह में पीछे नहीं हटाया।
अपनी बेटी के साथ रखा हजारों बच्चों के सर हाथ।
भीख माँगी मजूरी की पर छोड़ा न साथ।।
जो जहाँ मिला बाँटा स्नेह दिव्यांग, सामान्य में नहीं भेद।
सबको दी शिक्षा बेटी बचाओ का करती रहीं हेत।।
स्वावलंबी बनाया हर संतान को करती रहीं परवाह।
सब हों समान करे सब मदद यही थी उनकी चाह।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर
