जहां आज सन्नाटा सा पसरा हुआ है
कभी वहां कई जिंदगी बसा करती थी 
गगनचुंबी कंगूरे आसमान से बातें करते थे
दीवारें दुल्हन की तरह सजती संवरती थी 
दरवाजे खुले दिल की तरह खुले रहते थे
खिड़कियां बहू बेटियों की तरह मुस्कुराती थी
आंगन गुलाब की क्यारी सा महकता था 
रसोई से ममत्व की भीनी भीनी गंध आती थी
ड्राइंग रूप दादाजी की तरह रौबीला होता था
बैडरूम से श्रंगार की रोशनी छन छन कर आती थी
हंसी ठिठोली की स्वर लहरियां गूंजती रहती थी
घर में बने मंदिर से घंटियां नया उत्साह भरा करती थी
संस्कारों का वृक्ष फलता फूलता था इस घर में 
हलकी फुलकी डांट तुलसी की तरह निरोगी करती थी । 
बूढ़े मां बाप की तरह बूढ़ा हो गया है वह मकान 
अनुपयोगी, अव्यवस्थित, अप्रचलित , नाकारा
अब उसकी आवश्यकता किसी को भी नहीं है
पुराने मूल्यों की तरह फेंक दिये हैं पुराने रिश्ते 
अब तो सिर्फ मतलब का रिश्ता ही शेष रह गया है
वो पुराना मकान जो कभी “खानदान की शान” था 
आज मां बाप की तरह अपनी बरबादी पे आंसू बहा रहा है
हरिशंकर गोयल “हरि”
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *