रंजना को खुद उन पैंटिंग को देखकर आश्चर्य होता। क्या कोई चार साल की लङकी इतनी अच्छी पैंटिंग बना सकती है। वैसे रंजना बहुत सुंदर पैंटिंग बनाती थी। पर उसने बचपन में जो पैंटिंग बनायीं थीं, वे अद्वितीय थीं। अब सोलह साल की आयु में रंजना कोशिश करके भी उतनी अच्छी पैंटिंग नहीं बना पाती। हर चित्र जैसे खुद बोल रहा हो।
उन चित्रों के मुख्य पात्र एक ही युवक और युवती होते। एक चित्र में कल कल बहती नदी के किनारे बैठे दोनों एक दूसरे को प्रेम भरी नजरों से देख रहे थे । युवती एकदम गोरी और बहुत सुंदर। युवक सुंदर तो नहीं पर बदसूरत भी नहीं। पर दोनों ग्रामीण परिवेश के हिसाब से कपङे पहने हुए।
एक चित्र में युवती और युवक फसल काट रहे। किसी चित्र में पशुओं के साथ। इसी तरह के दस चित्र जो रंजना ने बचपन में बनाये थे, आज भी उसके सर्वश्रेष्ठ चित्र थे। आज भी हर प्रदर्शनी में वे चित्र रखे जाते।
रंजना को एक बात और आश्चर्य में डाल देती। आयु बढने के साथ साथ रंजना खुद उस चित्र की युवती जैसी लगने लगी थी। वैसे युवती के बाल बङे थे और रंजना छोटे बाल रखती थी। युवती ग्रामीण परिधान पहने थी और रंजना आधुनिक परिधानों की शौकीन। पर चित्र बाली युवती और रंजना का चेहरा और नाक नक्श बहुत मिलता। लगने लगता कि रंजना शायद आठ दस साल बाद उसी तरह की दिखने लगेगी। रंजना को उन चित्रों से लगाव का कारण भी यही था। वह उन चित्रों में खुद को देख रही थी। पर चित्रों में उसके साथ युवक कौन है, यह उसे अज्ञात था।
………….
स्कूल जीवन समाप्त करके रंजना का कालेज जीवन शुरू हो गया। वैसे वह कालेज की होनहार छात्रा है। पर उसकी पहचान एक बेहतरीन चित्रकार के रूप में भी है। कालेज के वार्षिक अधिवेशन में आयोजित प्रदर्शनी में उसने अपने चित्रों की प्रदर्शनी भी लगायी। उसके बचपन में बनायीं पैंटिंग भी उसने लगायी। देखने बाले आश्चर्य में पङ गये जब उन्हें पता चला कि ये पैंटिंग तो रंजना ने बचपन में बनायीं हैं।
दर्शकों में एक लङका पैंटिंग को ध्यान से देख रहा था। पैंटिंग को देखकर वह खुद को भी भूल गया। दोस्तो के बोलने पर वह होश में आया और चला गया। रंजना उसे जाता देखती रही। इसे कहीं तो देखा है। पर याद नहीं आ रहा। कभी बार अनेकों बार देखा व्यक्ति भी सामने होने पर ध्यान नहीं आता है। और जब ध्यान आता है तब तक वह जा चुका होता है। ऐसा ही इस बार हुआ। रंजना को जब ध्यान आया कि लङके की शक्ल बहुत हद तक पैंटिंग के युवक से मिल रही है, भले ही लङके ने आधुनिक जींस शर्ट पहन रखी है, और पैंटिंग में युवक कुर्ता पाजामा पहने है। फिर भी दोनों का चेहरा एक ही है। फिर रंजना पूरी प्रदर्शनी में उस लङके को ढूंढती रही। पर जो एक बार मिल कर भी छिप जाये, वह फिर आसानी से नहीं मिलता। दूसरी कहावत यह भी है कि जिन्हें ईश्वर मिलाना चाहते हैं, वह खोकर भी फिर से मिल जाते हैं। तो अब तो बहुत कुछ भाग्य पर निर्भर है।
क्रमशः अगले भाग में….
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
