कालेजों में वार्षिक अधिवेशन पर आयोजित प्रदर्शनी में बाहरी लोगों के आने पर कोई रोक न थी। वास्तव में बाहरी लोगों से टिकट के रूप में महाविद्यालय का काफी खर्च निकल जाता। कालेज के छात्र व छात्राऐं प्रदर्शनी में अपनी बहुमुखी प्रतिभाएं प्रदर्शित करते। जब उनकी विशिष्ट कला की दूसरे सराहना करते तो बच्चों का मनोबल बढता। छोटे कस्बों में इस तरह के आयोजन पर प्रायः प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है। पर बङे शहरों में यह आम बात है। ऐसे आयोजनों की व्यवस्था खुद छात्र और छात्राएं ही करते हैं।
   इंजीनियरिंग के तीसरे साल का छात्र रोहन पढाई में जितना होशियार था, संगीत में उतना ही तेज। बचपन से ही उसे संगीत का शौक था। बांसुरी तो ऐसी बजाता कि सुनने बाले वाह वाह कह उठते। छात्रावास में खाली समय में दोस्त उसे घेरे रहते। अलग अलग गानों की धुन बांसुरी से निकालने की फरमाइशें करते। रोहन हर गाने की धुन आसानी से बांसुरी से निकाल लेता। सिबाय नदी के किनारे फिल्म के मशहूर गाने ‘कौन दिशा को लेकर चला’ के। पता नहीं क्या बात थी कि जब भी रोहन इस गाने की धुन निकालने की कोशिश करता, अचानक कहीं खो जाता। फिर सुर से साथ छूट जाता। इस रहस्य को जितना समझने की वह कोशिश करता, उतना ही परेशान होता। अंत में रोहन ने इस परेशानी का अजब निदान निकाला। उस गाने की धुन निकालने की कोशिश ही बंद कर दी। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। 
    वैसे आज इंजीनियरिंग कालेज का अवकाश नहीं था। पर बच्चों का मन आज पढाई का नहीं था। शहर के एक अन्य विद्यालय में छात्रों ने प्रदर्शनी लगायी थी। सुना है कि छात्रों ने अनेकों कलाओं का प्रदर्शन किया है। कुछ बच्चे कला के शौकीन थे। तो कुछ के मन में दूसरे कालेज की लङकियों को देखने की चाह। सभी के अलग अलग कारण थे। पर आज इंजीनियरिंग कालेज के छात्र शहर के एक अन्य महाविद्यालय की प्रदर्शनी में घूम रहे थे। 
   ” रोहन। तू भी शुरू हो जा। अपनी बांसुरी लाया है या नहीं।” 
  “तू भी महेश। कभी भी कुछ भी बोलने लगता है।” 
   महेश रोहन का बेस्ट फ्रेड, दोनों छात्रावास के एक ही कक्ष में रहते। एक दूसरे के बङे राज़दार थे। 
   ” अरे। जब प्रदर्शनी हुनर के लिये लगायी है तो इसमें क्या फर्क पङता है कि हुनर किसका है। आखिर इनको भी तो पता चलना चाहिये कि इंजिनियरिंग के विद्यार्थियों में भी कुछ हुनर है।” 
    एक स्टाल पर लिखा था ‘ अपना मनपसंद गीत सुनें। पर टेप से नहीं।’ 
  स्टाल पर भीङ भी बहुत थी। लङकी लोगों की पसंद के गीत बङी अच्छी तरह गाकर सुना रही थी। पता नहीं रोहन को क्या हुआ, वह भी बांसुरी बजाने लगा। एक दम सुर से सधी बांसुरी बजी तो तालियां बजने लगीं। रोहन को लोगों ने घेर लिया। 
   ” अरे। आप तो बहुत अच्छी बांसुरी बजाते हैं। वैसे इस कालेज के तो नहीं लगते।” 
   ” जी ।सही कहा आपने। मैं इंजीनियरिंग का छात्र हूं।” 
   ” इंजीनियरिंग के छात्र और इतना अच्छा स्वर।” 
   ” क्यों। इसमें क्या दिक्कत है।” 
   ” दिक्कत तो कुछ नहीं। वैसे इंजीनियरिंग के छात्रों को पढाकू माना जाता है। बस इसीलिये अचंभा हुआ। “
  ” वैसे आपका नाम जान सकता हूं। मुझे लगता है कि मेरी आपसे अच्छी जमेगी।” 
  ” ओ रियली ।वैसे आपने मेरे मुंह की बात छीन ली। मैं पल्लवी बीए सैकंड ईयर की स्टूडेंट हूं। और आप। “
  ” मैं रोहन। बी टेक थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूं। “
   दोनों के बीच संगीत प्रेम की बजह से कुछ दोस्ती हो गयी। 
” अरे भाई। आप दोनों तो दोस्त बन गये। हमसे दोस्ती करने में कोई दिक्कत तो नहीं है। बाई द वे मैं महेश। मैं भी बी टेक थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूं। “
  महेश ने खुद व खुद दोस्ती कर ली। इसे बोलते हैं कि मान न मान, मैं तेरा मेहमान। वैसे इसमें परेशानी भी कुछ नहीं थी। पर रोहन को लग रहा था कि कोई परेशानी आने बाली है। अगर महेश साथ में है और कोई परेशानी न आये, यह कैसे संभव है। परेशानियों के आने की अलग बात है। वास्तव में महेश को तो परेशानियों को बुलाने की आदत थी। 
   ” आपके कालेज में कोई ऐसा दिख नहीं रहा जो मेरे दोस्त की कला को टक्कर दे सके।” 
  थोङी देर पहले रोहन की तारीफ में ताली बजाने बालों को अब सम्मान की फिक्र हो उठी। आखिर कालेज की इज्जत का सबाल है। फिर पल्लवी रोहन और महेश को कई स्टाल पर लेकर गयी। पर महेश हर जगह कमी निकाल देता। आखिर पल्लवी उन्हें रंजना की स्टाल पर ले गयी। 
   इस स्टाल पर सभी अवाक रह गये। जहाॅ महेश पैंटिंग की खूबसूरती को देख अचंभित था वहीं रोहन और रंचना के चकित होने की अलग बजह थी। रंजना रोहन को पहचानने की कोशिश कर रही थी। इसे कहीं तो देखा है। और रोहन के आश्चर्य की बजह थी कुछ स्वप्न। जो अक्सर रोहन को सोते समय दिखाई देते थे। रंजना को कैसे उन सपनों का पता। सचमुच उसी स्वप्न के दृश्य ही तो हैं। हालांकि युवक और युवती की शक्ल किससे मिल रही है, इस पर रोहन ने कभी विचार नहीं किया था। पर उसके सपनों को बङी खूबसूरती से कैनवास में देखकर रोहन के आश्चर्य में पङने की बजह तो है। 
   रंजना की तंद्रा तब टूटी जब रोहन चला गया। वह उसे पहचान कर कैंपस में तलाशने लगी। आखिर यह रहस्य क्या है। इन सबसे अलग पल्लवी को मजाक का विषय मिल गया। सचमुच इंजीनियरिंग कालेज का लङका रंजना पर कुछ जादू कर गया है। तभी तो वह उसे तलाश रही है। 
   अक्सर खोये हुए आसानी से नहीं मिलते। पर रोहन को भी यह रहस्य तो जानना ही है। अभी इतने लोगों के बीच वह चुपचाप चला गया पर वह खुद व खुद रंजना से फिर से मिलेगा, इस बात पर यकीन करने के पर्याप्त आधार हैं। 
क्रमशः अगले भाग में…
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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