वसुंधरा की आन तुम धरती के भगवान हो 
तेरी काया वज्र जैसी तेरे कायल समीर पावक 
तु नही विचलित कभी है पशु संग में और शावक 
तेरी घोर तपस्या से मिलता है अन्न सुअन्न  
आसमान सा लगता तुझको छोटा सा भूखंड
सर्दी की ठिठुरन तेरी है, तपती सांझ दोपहरी 
भादो का बरखा तेरे संग मिल गाता स्वर लहरी 
दिवस है तेरे श्रम का संगी रजनी का तु प्रहरी 
धीर अधीर होय ब्याकुल सा तु मानव का सहचर 
श्रम अनुरूप परिणाम न मिलता दशा ब्यथित कर देती 
धरा सुवासित तेरे दम विकल चित्त कर देती 
हे धरती के  देव तुम्ही हो जग के पालनहार 
तुझ सा कोई नृप नहीं होगा तू है तारणहार.!
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