भारत के राज्यों में पूर्व की तरफ स्थित है बिहार और उसी बिहार राज्य के वैशाली जिले में देसरी गांव है । उसी गांव में एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे एक पंचायत चल रही है । पांच  पंचों के अलावा गांव के कुछ निवासी भी वहां पर उपस्थित है । जिस कारण के लिए आज पंचायत बुलाई गई है उसकी ही  कार्यवाही   चल रही है । 
रामप्रवेश ! अगर तुझे अपनी जमीन वापस  चाहिए तो तुझे उस जमीन पर क्विंटल भर से ज्यादा अनाज उगाने होंगे तभी तू  उस जमीन का फिर से हकदार होगा । पंचों की कतार में बैठे अंबिका चौधरी ने रामप्रवेश से कहा था ।  
‘ लेकिन काका ! आप तो जानते ही हैं कि मेरी पढ़ाई अभी जारी है अभी – अभी मैंने बारहवीं  पास की है । ऐसे में अगर मैं गांव में आकर खेती करने लग गया तो मेरे कैरियर का क्या होगा ? ऐसे तो  मेरा भविष्य अंधकार  में चला जाएगा । क्या इस विकल्प के अलावा और दूसरा कोई विकल्प नहीं है काका ?’  रामप्रवेश ने पंचों की तरफ बारी –  बारी  से देखते हुए कहा था । 
‘ विकल्प नहीं हमारी शर्त है और अगर तुमने इस शर्त को नहीं माना तो तुम हमेशा के लिए उस जमीन को भूल जाओ और अपने माता – पिता को समझा दो कि उन्होंने तुम्हारी पढ़ाई के लिए जो यह जमीन हमारे पास गिरवी रखी थी वह हमेशा के लिए अब से  हमारी हो जाएगी  लेकिन ।’   अंबिका चौधरी  की कड़कदार आवाज उस बरगद के पेड़ के चारों तरफ गूंजने लगी । 
‘ लेकिन क्या काका ?’  रामप्रवेश ने अंबिका  चौधरी  के अंतिम शब्द को दोहराया था । 
‘ लेकिन अगर तुम उस  जमीन पर क्विंटल भर अनाज पैदा कर देते हो तो अंबिका चौधरी  वह  जमीन सबके सामने  तुम्हारे नाम कर देंगे और अगर तुम ऐसा नहीं कर पाए तो तुम्हारे पिता इस जमीन को अंबिका चौधरी   के नाम करेंगे । चूंकि  तुम पढ़े-लिखे हो इसलिए हमारी बातों को बेहतर समझ  सकते हो रही वजह है कि हम पंच तुम्हारे पिता से नहीं बल्कि तुमसे बात कर रहे हैं ।’  पंच में से ही एक जिनका नाम रामबाबू सिंह था ने रामप्रवेश की तरफ देखते हुए कहा था । 
वर्तमान में
छोटे दादू ! हम सबको आगे की कहानी आपकी जुबानी नहीं बल्कि बड़े दादू की जुबानी सुननी  हैं । दस  साल की रिया  ने रामप्रवेश के छोटे भाई रामकृष्ण से कहा । 
‘ अच्छा तो मेरी प्यारी सी गुड़िया को छोटे दादू से नहीं बल्कि  मुझसे सुननी  है ।’  रामप्रवेश ने अपनी पोती रिया को अपने पास बैठाते हुए कहा । 
‘ हां दादू ! आप की कहानी हमें आप ही से सुननी है ।’ रिया ने  बड़ी मासूमियत से अपने दादा जी की तरफ देखते हुए  कहा । 
‘ चलो फिर !  शुरुआत उसी पंचायत से करते हैं ।’ रामप्रवेश ने सभी बच्चों की तरफ देखते हुए । 
पैंतालिस साल पूर्व का समय
पंचायत में  मैंने अपनी जमीन बचाने के लिए हाॅं तो कर दिया था  लेकिन मेरे दिमाग में एक ही सवाल  चल रहा था कि मैं ऐसा कैसे कर पाऊंगा ? मैं किसी भी परिस्थिति में अपने पिता की जमीन को किसी और के नाम पर होने नहीं दे सकता था । उस समय मुझे वह दिन याद आ रहा था जब मेरे पिता ने मेरी पढ़ाई के लिए नम आंखों से अंबिका चौधरी के आगे उस जमीन के कागजात रखे थे । उनके होठों पर मुझे दिखाने के लिए मुस्कुराहट थी लेकिन उनके दिल में तो कुछ और ही चल रहा था जिसे मेरा दिल भली भांति जानता था । मैंने अपने पिता से कहा तो नहीं था कि जैसे ही मैं कमाने लगूंगा सबसे पहले गिरवी रखे इसी जमीन को छुडाऊंगा लेकिन मैंने अपने दिल से जरूर यह बात कही थी । मैं उस बात को कैसे भुला  सकता था ? मुझे किसी तरह यह तो करना ही होगा ।  यही  सोचते – सोचते मैं घर पहुंच गया । 
‘ बेटे ! तू कहां था इतनी देर ?  हम लोग कब से खाने पर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं ?  कोई कह रहा था कि तू पंचायत में है । मैं तो वहां आना चाहता था लेकिन तेरे दोस्त ने मना कर दिया । मुझसे कहा कि तू  आकर हमें बता देगा । वैसे भी मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है नहीं तो मैं खाट पर पड़ा नहीं रहता ।’  मेरे पिताजी ने खांसते हुए कहा था । 
‘ कुछ खास बात नहीं है बाबूजी । मुझे तो बहुत भूख लगी है खाना खाते-खाते कुछ बातें करनी है आपसे । अम्मा मेरा  खाना लगा  दो ।’      मैंने अम्मा से कहा था ।
अम्मा ने मेरा और बाबूजी का खाना लगाते हुए मेरी तरफ देखते हुए कहा था :- ” रामू …. अम्मा बाबूजी  और मेरे दोस्त सभी मुझे प्यार से रामू कहते थे । हां  तो अम्मा ने कहा था :- ” रामू ! अबकी बार तू  कितने दिनों के लिए आया है । कल अगर  जाना है तो आज ही  मुझे बता दे । मैं तेरे लिए कुछ बना दूंगी । घर का बना  खाना सेहत को लगती है । देख तो ! कितना पतला हो गया है रे तू ?” 
‘ अम्मा ! शायद अब मैं कुछ महीनों के लिए शहर ना जा पाऊं । कुछ काम है जो मुझे यहां पर करना है ।’ मैंने कहा । 
‘ तुझे क्या काम करना है गांव में ? तू तो शहर पढ़ने गया था । वहां पढे़गा तभी तो बड़ा अफसर बनेगा और तभी तो हमारे दिन फिरेंगे । तेरी पढ़ाई के लिए ही तो अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है । तू अगर गांव में रहेगा तो कैसे तू अपना सपना पूरा करेगा ।’  इस बार बाबूजी ने कहा था । 
मैंने आज पंचायत में हुई सारी बातें बाबूजी और अम्मा को बता दी । अम्मा  तो अपना  सर  पीटने लगी और काका को भला –  बुरा कहने लगी लेकिन बाबू जी चुप थे उनकी यही चुप्पी मुझे चुभ रही थी । मेरी बातें सुनकर में क्या सोच रहे हैं ? इसे जानने में मेरी रुचि थी लेकिन वों कुछ बोल ही नहीं रहे थे । कुछ देर बाद उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी और मेरी तरफ देखते हुए कहा :- ”  बेटा यह कैसे संभव है ? मैं इतने सालों से खेती कर रहा हूॅं  लेकिन उस जमीन पर आज तक मैं  क्विंटल भर अनाज कभी नहीं उपजा पाया फिर तुम कैसे ? तुमने इनकार क्यों नहीं कर दिया ? जो चीज संभव ही नहीं है उसे करने का वादा तुमने कैसे कर दिया ?  हमारी पुरखों की जमीन चली जाए तो जाने दो लेकिन मैं तुम्हें उस  जमीन पर खेती नहीं करने दूंगा । पढ़ –  लिख कर बड़े आदमी बनो । इस  खेती – बेती  के काम में ना तो पैसा ही है और ना ही कोई इज्जत ही । इस गांव  में तो बड़े – बड़े जमींदारों जिनके पास हजारों बीघा जमीन है सिर्फ उन्हीं को  इज्जत मिलती है हम जैसे मामूली से किसान को नहीं । मैं तुम्हें किसान नहीं बनने दूंगा चाहे इसके लिए मुझे अपनी पुरखों की जमीन ही ना खोनी पड़े । 
‘ आप शांत हो जाइए बाबूजी । वैसे भी आप की तबीयत ठीक नहीं है । आप ज्यादा परेशान ना हो । हमारे जीवन में जो भी समस्याएं  आती है अपने साथ उसका कुछ – ना –  कुछ  निदान  तो  साथ  ही लाती है । मुझे उस निदान को खोजना है उसके बाद हमारी सारी समस्याएं चुटकियों में खत्म । वैसे भी हमारे गांव के किसान वही परंपरागत तरीके से खेती करते ही  चले आ रहे हैं । जहां उनकी लागत भी अधिक होती है और उन्हें मेहनत भी ज्यादा करनी होती है इसके बाद भी उन्हें उनके खेत से भरपूर  पैदावार नहीं मिल पाती है । मुझे कुछ ऐसा करना होगा जिससे लागत उतनी ही हो लेकिन पैदावार अधिक से अधिक हो । ऐसा कोई –  ना  – कोई उपाय तो होगा ही  जिससे हम अपने खेत की पैदावार को बढ़ा सकते हैं । मुझे सिर्फ वही उपाय ढूंढना है ।  मैंने अपने चेहरे पर आत्मविश्वास लाते हुए कहा था । 
‘ इस समस्या का  सिर्फ एक ही उपाय  है कि तुम कल के कल ही शहर के लिए रवाना होगे और वहां जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करोगे । यहां गांव में रहकर इस  झमेले में मत पड़ो बेटा ।’  बाबू जी ने स्नेह भरी आंखों से मेरी तरफ देखते हुए  कहा था । 
‘ बाबूजी मैं भी थक चुका हूं और आप भी आराम करिए । इसके बारे में बाद में सोचते हैं ।’  मैंने बाबूजी को  खाट पर लेटाते हुए उनसे कहा । 
अगले दो  दिनों तक मैं दिन –  रात उस उपाय  के बारे में  ही सोचता रहा । मैं अपने घर के आंगन में बैठा खेती के परंपरागत तरीकों को अपनाते हुए उस में क्या बदलाव किया जा सकता है ?  इसके बारे में सोच ही रहा था कि तभी मेरा दोस्त महेश मुझसे मिलने आया । 
वर्तमान समय 
‘ महेश दादू आप ?  आपको भी बड़े दादू की  कहानी मालूम है ?’    चौंकते  हुए रिया का बड़ा भाई रोहित बोल पड़ा । 
‘ तुम्हारे दादू का मैं खास दोस्त था । अपने दोस्त को  कैसे परेशानी में देख सकता था मैं ? अकेला छोड़ भी नहीं सकता था तुम्हारे दादू को । हम दोनों बचपन से ही एक –  दूसरे के इतने करीब रहे हैं कि कोई एक अगर परेशान रहे तो  दूसरे  को  नींद तक नहीं आती है । मुझे ईश्वर ने ऐसा दोस्त दिया जिसकी मदद में कर पाया इसके लिए मैं ईश्वर का धन्यवाद देता हूॅं । रामप्रवेश के दोस्त महेश ने कहा ।
‘ मेरी ईश्वर से यही विनती है कि तूझ जैसे दोस्त का साथ अंतिम क्षण तक हो ।’  रामप्रवेश ने महेश की तरफ देखते हुए कहा ।
‘ दादू ! आगे  की कहानी बताइए ना ।’  पास बैठी रिया ने चहकते  हुए रामप्रवेश से कहा ।
रामप्रवेश बीते दिनों को याद करते हुए कहने लगा ।
पैंतालिस साल पूर्व का समय 
महेश ने आते ही पहले तो मेरा हाल चाल पूछा क्योंकि इससे पता था कि मैं ठीक नहीं हूॅं । बाबूजी और अम्मा के बारे में पूछने के बाद इसने मुझसे वों  बातें कहीं जिसके बाद मैं तुरंत ही बाबूजी और अम्मा के पास गया और उनसे कहा कि मैं शहर जा रहा हूॅं । बाबू जी ने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि हमारी फिक्र मत करना बेटा । वहां जाकर खूब मन लगाकर पढ़ना और देखना एक दिन तुम बहुत बड़े अफसर बनोगे और उस दिन में छाती चौड़ी करके कहूंगा कि मेरा रामप्रवेश बड़ा अफसर बन गया । 
मैं बाबूजी की बातें सुनकर मन ही मन मुस्कुराया और उसके बाद मैंने अम्मा और बाबूजी के पैर छुए । एक – दो  कपड़े लिए और एक घंटे  बाद मैं महेश के साथ शहर जाने वाली बस स्टॉप पर खड़ा था । हमारे गांव से बस स्टॉप  दूर था । वहां पर  पहुंचने के लिए लगभग एक घंटा  तो लग ही जाता  था । मैं महेश की साइकिल पर बैठकर आया था इसलिए मुझे थोड़ा कम समय लगा । बस आ गई और मैं उस पर सवार हो गया । मैंने महेश से कहा कि मैं दो  दिन बाद फिर इसी बात से वापस आऊंगा तुम  मेरा इंतजार करना । 
दो दिन बाद जब मैं बस स्टॉप पर उतरा । मैंने महेश को वहीं पर पाया । महेश के साथ मैं अपने गांव की तरफ चला । रास्ते में मैंने महेश से वह सारी बातें कहीं जो मैंने शहर में सुनी थी या यूं कहो कि मैं शहर से सीखकर आया था । जो कि मैं दोपहर में गांव में स्थित अपने घर पहुंचा था इसलिए मुझे उस दिन शाम  का वक्त मिल गया जिसमें मैंने अपनी पूरी तैयारी योजनाबद्ध तरीके से कर ली । 
मैंने अगले दिन से ही खेतों में काम चालू कर दिया । जुताई , बीज उपचारण  आदि कामों को उपयुक्त  समय से करने के बाद वह समय भी आया जब फसल की कटाई करनी थी । फसल की कटाई भी हो गई । उसकी ओसाई के बाद जब गेहूं को तौला गया तो वह क्विंटल भर तो नहीं था लेकिन उससे पांच  किलो  ही कम  था । सभी को आश्चर्य हो रहा था कि यह मैंने किया क्योंकि इससे पहले इतनी जमीन पर इतनी फसल कभी भी और किसी ने नहीं  उपजाई  थी । 
सभी मुझसे एक ही सवाल पूछ रहे थे कि यह मैंने  कैसे किया ? सभी के सवालों का जवाब देते हुए मैंने कहा कि  आप सभी खेती तो करते हैं लेकिन वही पुराने परंपरागत तरीके से खेती करने के कारण आपकी  फसल कम मात्रा में होती है और उससे कम आय प्राप्त होती है । कृषि विज्ञान केंद्र जो हमारे जिले में स्थित है वहां पर हम जैसे किसानों को वैज्ञानिक ढंग से  खेती करने के बारे में बताया जाता है । वैज्ञानिक खेती के तहत हमें उन्नत किस्म के बीज  का चयन … बीज उपचारण और इसे बोने के उपयुक्त समय के बारे में जानकारी दी जाती है । मैंने भी उसी वैज्ञानिक खेती के अनुसार ही खेती की और परिणाम आप सबके समक्ष है । 
मुझे खुशी थी कि अंबिका काका ने मुझे हमारी जमीन लौटा दी थी लेकिन उनके कहे शब्दों ने मुझे अपनी जिंदगी का रूख  किस तरफ मोड़ना है उसकी दिशा प्रदान कर दी थी । उनके अनुसार मुझ में वें भावी किसान पहले ही देख चुके थे और यही वजह थी कि उन्होंने भरी पंचायत में मेरे सामने जमीन वाली शर्त रखी थी । उन्हें मालूम था कि मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा और आज मुझे इस मुकाम पर देखकर उन्हें बेहद ही खुशी हो रही थी । खुश तो मैं भी था लेकिन मेरे अम्मा बाबूजी के सपनों का क्या होगा यह भी मैं सोच रहा था । 
वर्तमान समय 
किसानों को भी इज्जत मिल सकती है । वें  भी बड़े आदमी बन सकते हैं । वें  भी कृषि के क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकते हैं । मेरी इसी  सोच ने मुझे कृषि के क्षेत्र में पूरी तरह उतार दिया । आगे चलकर मैंने इंटरक्रॉपिंग ( अंतर ) फसल ! यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें  एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसल उगाई जाती है । इस पद्धति से मुझे तो लाभ हुआ ही साथ ही गांव के और भी किसानों ने इससे लाभ उठाया । यह पद्धति आज भी हमारे खेतों में अपनाई जा रही है । कल मैं तुम सबको अपना पूरा फिर दिखाऊंगा । रामप्रवेश ने बच्चों की तरफ देखते हुए कहा । 
‘ दादू ! अब मेरी समझ में आया कि  कल जब हम लोग आ रहे थे और हमारे ड्राइवर को घर का रास्ता मालूम नहीं था तब उसने एक गांव वाले से आपका नाम लेकर आपके घर का पता पूछा था । वह गांव माला तो आपके नाम से आपको जानता ही नहीं था तभी पास में ही करें एक और आदमी ने कहा कि अरे घोंचू इन्हें वैज्ञानिक बाबा के पास जाना है उनके घर का पता बता । तब जाकर उस गांव वाले ने हमारे ड्राइवर अंकल को यहां का पता दिया था । आज से हम सभी बच्चे भी आपको वैज्ञानिक बाबा कह कर ही बुलाएंगे । क्यों ठीक है ना दादू ? हम आपको वैज्ञानिक बाबा बुला सकते हैं ना ?’ रिया ने मुस्कुराते हुए अपने दादू रामप्रवेश से कहा ।
सारे गांव के लोग मुझे इसी नाम से जानते हैं । अब तो मुझे इसकी आदत पड़ गई है । चलो ! तुम लोग भी मुझे वही कह कर पुकारना । रामप्रवेश ने हंसते हुए कहा।
रामप्रवेश की बातें सुनकर सभी बच्चे हंसने लगे और जोर जोर से चिल्लाने लगे वैज्ञानिक बाबा ….वैज्ञानिक बाबा । रामप्रवेश जी को जैसे कुछ याद आया उन्होंने बच्चों को चिल्लाने से रोकते हुए कहा कि बच्चों ! अपने  जीवन में तुम एक बात हमेशा याद रखना । हमेशा ही अपने खेत –  खलिहान की हिफाजत करते रहना । अपने दिल में इनके लिए हमेशा ही वही इज्जत और सम्मान रखना जितने तुम मेरे  और अपनों के लिए रखते हो क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूॅं  इन्हीं की बदौलत हूॅं  क्योंकि यही तो हमारे अन्नदाता है । मेरे  मुश्किल वक्त में भी इसे अन्नदाता ने मेरी मदद की थी और आज भी इन्हीं की बदौलत हमारी थाली में दो वक्त की रोटी आती है । मैं तो उस दिन से इन्हीं को अपना अन्नदाता मानता हूॅं  और इनकी सेवा में खुद भी लगा रहता हूॅं  और लोगों को भी सलाह देता हूॅं  कि इनकी सेवा करें । जितना हम  इनके  लिए  करेंगे उससे ज्यादा यह हमें लाभ देंगे । मेरे पीछे – पीछे तुम लोग भी यह पंक्तियां बोलना 👇
मेहनत  करने   वालों    के   घरों   को 
अन्नों          से          भरती         है 
दो   वक्त   की  रोटी   सभी   को  मिले 
इसके दिलों  में  यही बात  तो  रहती  है 
सभी हम जैसों की उनसे तुलना करते हैं 
लेकिन मेरी  नजर  में  मैं  नहीं    बल्कि 
यें           खेत – खलिहान              ही 
हमारी     अन्नदाता     कहलाती      हैं ।
रामप्रवेश जी के पीछे – पीछे सभी बच्चे खुश होकर  उनके द्वारा बोली जा रही  पंक्तियों को दोहराने लगे । 
                                धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
” गुॅंजन कमल ” 💗💞💓
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