हो बुद्धि विकसित-विचारशील,
हो मन सदा जो संयम में
भुजा में जोश भरा हो ऐसा,
चाहे तो पर्वत चटका दे!
नदियों का मुख भी जो मोड़ सके,
मरुस्थल को भी उपवन करे!
आंखो में भर ले यूँ आकाश,
कि संसार को अपना बना ले
पांव मगर टिके धरा पर,
तज अंह, सबको अपना ले!
संस्कृति का पालन हो और
नारी को सम्मान जो दे
जीवों के प्रति करुणा हो,
प्रकृति का संरक्षण हो,
शक्ति जिसमें हो सृजन की,
हो सामर्थ्यवान, धरा हो रक्षण करे
वो युवा जिस देश का हो,
बिन लड़े ही विश्व विजय कर ले!
शालिनी अग्रवाल
जलंधर
