जाते हो तो जाओ तुम परदेश , 
चाहें बदलो अपना भेष – परिवेश , 
तन – मन में रचा – बसा स्वदेश , 
अपना देश याद आएगा । 
भूल न पाओगे माटी की गन्ध , 
वतन अपना याद आएगा । 
बहुत लुभावने होंगे दृश्य अनेक ,
सुख – सुविधाओं के भी होंगे ढेर । 
जब-जब हवा बहेगी प्रतिकूल , 
अपने देश की माटी का रंग , 
रह – रह कर तड़पाएगा। 
अपना वतन फिर याद आएगा । 
जब-जब बागों में  रंग – बिरंगे फूल खिलेंगे। 
तितली – भँवरे अपने-अपने सुर  छेड़ेंगे । 
हवाओं में घुलेगा जब परदेसी संगीत । 
सावन का गीत याद आएगा । 
मन रह – रह पावसी गीत गुनगुनाएगा । 
अपना वतन बहुत याद आएगा । 
ऋतु बसन्त खटकाएगी द्वार । 
बीथियों में बहेगी बासन्ती बयार  । 8 ९
वन – उपवन महकेगा घर – संसार । 
अम्बर रंग बरसाएगा । 
मन भटकेगा वतन की गलियों में , 
फागुन याद आएगा । 
प्रज्ज्वलित दीवाली के दीए । 
टेसू – फूलों का रंग बरसे । 
खेतों में गेहूँ – धान पकेंगे । 
प्यार अपनों का याद आएगा । 
मन बेचैन बहुत तड़पाएगा । 
अपना देश याद आएगा । 
मीरा सक्सेना माध्वी 
नई दिल्ली 
स्वरचित , मौलिक एवं अप्रकाशित ।
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