वैसे रामचंद्र बहुत सहनशील व्यक्ति थे। पर जब उन्हें गुस्सा आता तो बहुत ज्यादा आता। फिर किसी की हिम्मत उनके सामने न पढने की नहीं होती। दुर्भाग्य से ऐसा ही दिन आज फिर था।
   राधेलाल ने कितनी ही बार रामचंद्र जी के गुस्से को झेला था। पर वह जानता था कि रामचंद्र जी ऊपर से ही सख्त हैं। भीतर से बङे उदार हैं। अक्सर नारियल के सख्त खोल के भीतर मुलायम नारियल होता है। एक बार तो रामचंद्र ने राधेलाल को नौकरी से ही निकाल दिया था। फिर गुस्सा ठंडा होते ही राधेलाल को मनाने आये थे।
   आज भी राधेलाल चुपचाप रामचंद्र जी की फटकार सुन रहा था। फिर धीरे से बोला – ” मालिक। गलती माफ करो। रात के बक्त बेचारी लङकियां कहाॅ जातीं। इतनी भीङ में उन्हें शायद ही कहीं कमरा मिलता। वैसे अगर मालिक चाहें तो उन्हें कह देता हूं कि बस आज रात ही रुककर कल सुबह चले जाना। मालिक आपके सोने की व्यवस्था कर दी है। अब गुस्सा मत हो।”
   रामचंद्र जी थोङे नरम पङे ।पर राधेलाल अकेले लङकियों से कहने जाने से अचकचाने लगा। अगर मालिक साथ होंगें तो लङकियां भी समझ जायेंगी कि मैं कोई झूठ नहीं बोल रहा। सचमुच मालिक आये हैं। फिर कल सुबह चली जायेगी। संभव है कि उन्हें कहीं और कमरा मिल जाये।
   रामचंद्र जी को भी राधेलाल की बात ठीक लगी। दोनों कमरे के बाहर पहुंचे और राधेलाल ने कमरा खटखटाया। रंजना ने कमरा खोला।
   ” नमस्ते अंकल जी। बताइये क्या बात है।”
   ” बेटी ।ये हमारे मालिक आये हैं। वैसे कमरा इन्हीं का है। पर अब रात में तुम कहाॅ जाओंगीं। कल सुबह चले जाना।”
  ” अंकल जी ।कल सुबह ही हम गैस्ट हाउस खाली कर देंगें। आप निश्चिंत रहें। आपका बहुत धन्यवाद कि आपने हमें रात गुजारने को जगह दी। “
  रामचंद्र रंजना को एकटक देखते रहे। विचारों में मग्न हो गये। अपनी बेटी वीना याद आ गयी। इस आयु पर बिलकुल ऐसी ही दिखती थी। अचानक वह फिर से राधेलाल पर नाराज हो गये।
  ” तुम भी राधेलाल। अब लङकियों को गैस्ट हाउस खाली क्यों करने की बोल रहे हों। कल कौन सा कम भीङ होगी। इन्हें कहाँ कमरा मिलेगा। फिर सुबह सुबह लङकियां दर्शन करने और घूमने जायेंगी कि दूसरे गैस्ट हाउसों के चक्कर लगायेंगीं।”
   फिर रंजना को बोलने लगे।
  ” लली। कहाॅ से आयी हों। “
  ” अंकल बुलंदशहर के पास से। हमें पता नहीं था कि इतनी परेशानी होगी। नहीं तो अभी नहीं आते। “
” कोई बात नहीं लली। अब आराम से रुको। कोई भी दिक्कत हो तो मुझे बता देना। जितने दिन रुकना चाहो, रुक लेना। मुझे क्या है। मैं तो रामचंद्र के कमरे में रुक लूंगा। “
   फिर अचानक भावावेश में उनका हाथ उठा और रंजना के सर पर पहुंच गया। कुछ आंखों में नमी आ गयी। रंजना और पल्लवी भी समझ नहीं पाये कि यह क्या हुआ। अभी तो अंकल जी खुद बताने आये थे और अब खुद कहीं और न जाने की बोल रहे हैं। पर राधेलाल सब समझ रहा था। उसे पता था कि यही होगा।
………
  रात में रामचंद्र को नींद नहीं आ रही। वैसे चुपचाप अपनी चारपाई पर लेटे थे। नीचे राधेलाल बिस्तर पर लेटा था। उसकी आंखों में नींद थी। पर वह भी जानबूझकर सो नहीं रहा था। सोच रहा था कि मालिक कुछ बोलेंगे। पर जब रामचंद्र ने कुछ नहीं कहा तो उसने खुद शुरुआत कर दी।
   ” नींद नहीं आ रही मालिक।”
   ” हूं। तुम सो जाओ राधेलाल।”
    “क्या सोच रहे हो मालिक।”
   ” कुछ भी तो नहीं।…..”
   फिर कुछ देर चुप्पी रही। और चुप्पी टूटी रामचंद्र की आवाज से। 
   ” राधेलाल। आज वीना की बहुत याद आ रही है। मैं उसे बङा प्यार करता था। वह भी अपने बापू के लिये जान लुटाती थी। मेरी मन की हर बात समझ जाती थी। कभी भी उसने कोई जिद नहीं की। और जब जिद की तो ऐसी। आखिर मैं उसका बाप था। उसका भला ही चाहता था। उस भिखमंगे के साथ वह कैसे खुश रहती। आखिर इस धन दौलत का क्या मतलब। एक से एक पढे लिखे और रईस लङकों के रिश्ते आ रहे थे। फिर मेने अपने बाल कोई धूप में सफेद नहीं किये। आदमी की फितरत पहचान जाता हूं। इसीलिये उसे मना किया। पर वीना भी मेरी बात माने बिना चली गयी, उस धोखेबाज रामू के साथ। आखिर बालिग थी वह। मैं रोक नहीं पाया। “
   इस बार आंखों में नमी के साथ रामचंद्र के मुख से कुछ अस्पष्ट सी आवाज आने लगी। जैसे कोई बहुत जोरों से रोना चाहता हो पर यत्नपूर्वक अपना मुख बंद किये हो। फिर आवाज कुछ गूं गूं जैसी आने लगती है। 
   थोङी देर बाद गूं गूं की आवाज आनी बंद हो गयी। आदमी और औरत में यह एक अंतर है। औरत अपने दुख को आसानी से आंसुओं में बहा देती है। पर आदमी अपने दुख को प्रगट करना नहीं चाहता। फिर चाहे भीतर ही भीतर कितना भी जलता रहे। 
   ” मैं उस कपटी रामू को नहीं छोङूंगा। कहीं भी छिपा हो, उसे ढूंढकर निकालूँगा। उसकी माँ ने तो खूब जेल की चक्की चलाई है। सुना है कि कुछ साल पहले अच्छे आचरण और औरत होने की बजह से जेल से छूट गयी है। पर उसकी हिम्मत गांव की तरफ आने की नहीं हुई। कोई बता रहा था कि अब वह यहीं वृन्दावन में भीख मांगती फिरती है। अच्छा है.. बहुत अच्छा है। माॅ और बेटे ने मिलकर मेरी बेटी को मारा। उसे तो अभी कीङे पङेंगें। पर वह रामू कहाॅ गया। इतनी बङी दुनिया में कहीं छिपा बैठा है। ढूंढ लूंगा उसे। फिर ऐसी मौत दूंगा उसे कि लोग भी याद रखेंगे। “
   एक बार फिर से गूं गूं की आवाज आने लगी। राधेलाल बिस्तर पर बैठ गया और रामचंद्र जी के चुप होने का इंतजार करने लगा। इस बार गूं गूं की आवाजें देर से बंद हुईं। राधेलाल कुछ देर शांत रहा। मानों कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा है। वैसे आज उसने रामचंद्र जी का रूम लङकियों को देकर हिम्मत की शुरुआत तो कर दी थी। 
   ” मालिक। मालूम नहीं कि मेरा बोलना ठीक है या नहीं। छोटा मुंह और बङी बात।” 
  ” क्या कहना चाहते हों राधेलाल। साफ साफ कहो।” 
  ” मालिक। वीना बिटिया ने हमेशा आपके दिल की बात सुनी थी। पर आप ही उनके दिल की बात नहीं सुन पाये। आपको लगा कि धन ही उसके जीवन में खुशियां लायेगा। पर एक बात पूछूं मालिक। आपके पास इतनी संपदा है। पर मुझे तो नहीं लगता कि आप खुश हों। असल खुशियां तो प्रेम से आती हैं। रामू के प्रेम में ही वीना बिटिया की खुशी थीं जो शायद आपको दिखी नहीं। “
  रामचंद्र राधेलाल की बात सुनकर बौखला गये। 
” राधेलाल। तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है। मान लिया कि धन धान्य से खुशियां नहीं मिलतीं। यह भी माना कि मैं अपनी बेटी के दिल की बात समझ न पाया। पर रामू ने मेरी बेटी को क्यों मार डाला। वह तो उससे प्यार करता था।” 
  “फिर मालिक। मैं यही कहूंगा कि आप कैसे कह सकते हैं कि वीना बिटिया को रामू ने मार दिया। “
” तुम भी राधेलाल। शायद तुम्हें याद नहीं है कि उसकी माॅ ने खुद अपना जुर्म स्वीकार किया था। “
” सब याद है मालिक। रामू की माॅ ने जुर्म स्वीकार नहीं किया था। बल्कि पुलिस ने उसे असहनीय उत्पीड़न कर मजबूर किया था कि वह जुर्म स्वीकार करे। मालिक। पुलिस की पिटाई तो अच्छे अच्छे अपराधी भी जुर्म कबूल कर लेते हैं। मालिक… । आपने बहुत गलत किया। केवल आपके शक को सही सिद्ध करने के लिये एक गरीब औरत को जो सहन करना पङा, उसे मैं कह भी नहीं पा रहा हूं। “
   ” राधेलाल…। ” रामचंद्र का स्वर अब जरा तेज हो गया।” अरे मेने कोई जुल्म नहीं किया। ये लातों के भूत कभी बातों से नहीं मानते। अपराधी कभी आसानी से अपराध स्वीकार नहीं करता। नहीं पुलिस को इतना निर्दयी बनने की क्या जरूरत है। “
  ” कुछ भी कहो मालिक। पर सच तो यह है कि रामू भी वीना बिटिया को बचाते हुए उस दिन मारा गया था। वैसे यह मेरा विश्वास था पर आज यकीन में बदल गया है। “
” वो कैसे। “
” मालिक। जिस तरह इस लङकी की शक्ल वीना बिटिया से मिल रही है, उसी तरह उनके साथ आये एक लङके की शक्ल बिलकुल रामू से मिलती है। फिर जो मैं सोच रहा हूँ, वही सच है। “
   उसके बाद उस कमरे में शांति छा गयी। रामचंद्र पहली बार अपनी पूर्व धारणा से अलग सोचने लगे। वीना का कातिल तो उन्हें समझ नहीं आया पर एक गरीब औरत के उत्पीड़न का दोषी वह खुद को समझने लगे। कभी भी किसी ने ऐसा नहीं कहा था कि वीना उस घर में खुश नहीं है। पर उनकी एक गलत धारणा ने उस औरत को अत्याचार सहने के लिये मजबूर किया जो खुद अपने बेटे के गुम होने से दुखी थी। फिर थोङी देर बाद गूं गूं की आवाजें आने लगीं। पश्चाताप की अग्नि रूपी हवन में ये आवाजें किसी वेदमंत्र से कम नहीं थीं। 
क्रमशः अगले भाग में….
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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