कभी अभिमान तो कभी स्वाभिमान है पिता
कभी धरती तो कभी आसमान है पिता
जन्म दिया है अगर माँ ने,जानेगा जिससे जग वो पहचान है पिता
ऊँगली को पकड़ कर सिखलाता,जब पहला कदम भी नहीं आता
नन्हे प्यारे बच्चे के लिए,पापा ही सहारा बन जाता
पापा हर फर्ज निभाते है,जीवन भर कर्ज चुकाते है
बच्चे की एक ख़ुशी के लिए,अपने सुख भूल ही जाते है
फिर क्यों ऐसे पापा के लिए,बच्चे कुछ कर नहीं पाते है
ऐसे सच्चे पापा को क्यों,पापा कहने में भी सकुचाते है
पापा का आशीष बनाता है,बच्चे का जीवन सुखदायी
पर बच्चे भूल ही जाते है,यह कैसी आंधी है आई
जिससे सब कुछ पाया है,जिसने सबकुछ सिखलाया है
कोटि नमन ऐसे पापा को,कभी कंधे पे बिठा के मेला दिखाता है पिता
कभी बनके घोड़ा घुमाता है पिता,माँ अगर पैरों पर चलना सिखाती है,पैरों पर खड़ा होना सिखाता है पिता।
रंजना झा
