उम्र बीत जाती पाने को..

अपनी छोटी सी पहचान
बड़े यत्न से मिल पाता है,
रोटी कपड़ा और मकान.. ! 
ईमानदारी की निति अपना कर 
सर से पांव पसीने में डुबाकर
करता जाता अगणित काम
मूलभूत आवश्यकताओं को 
करना है पूरा, रह जाता कई 
ख्वाब भी अधूरा.
खुद को तराशते.
हालात को संभालते
मुश्किलों से उबरते 
ढुंढ लेते हैं अपना मुकाम 
हार जीत जीवन का हिस्सा
लिखते जाते अपना किस्सा
कौन कहाँ किसको दे पाता
बिन रोटी के अतुलनीय ज्ञान
कहाँ ठौर मिलता है जमीं पर
गर ना हो अपना एक मकान?
अनगढ कहानियों की तरह 
उलझा है इंसान .. 
प्राप्त करने को “रोटी कपड़ा और मकान” !!
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