राजतिलक ये होता रहता है पीढ़ी दर पीढ़ी।
राजाओं के महल में जब आती है नई पीढ़ी।
जन्में नवजात शिशु को राजकुमार हैं कहते।
राजकुमार के पिताश्री को सब राजा कहते।
राजतिलक होती धूमधाम से महाराजा कहें।
राजा के पिताश्री को ही सब महाराजा कहें।
यही प्रक्रिया चलती है राजा के हर पीढ़ी में।
राजतिलक होती रहती है उस वृद्ध पीढ़ी में।
राजा महाराजा भी बने केवल ज्येष्ठ संतान।
कभी-2 अपवाद भी बने कोई दूजी संतान।
कुछ राजाओं के जिनके संतान नहीं होती।
लेते हैं वे गोद किसी को वही संतान होती।
उसका करें राजतिलक बनता है महाराजा।
उसकी भी पीढ़ी दर पीढ़ी बनती महाराजा।
कुछ राजाओं के पुत्री होती पुत्र नहीं होता।
राजा पुत्री के बेटे को गद्दी देता राजा होता।
धूमधाम से उसका राजतिलक भी है होता।
उस राज्य के राजमहल का वो राजा होता।
वंश चला तो निज पुत्रों में ज्येष्ठ बने राजा।
यह राजा आगे चलके बनता है महाराजा।
वंश बढ़ा न आगे तो दत्तक पुत्र बने राजा।
राजतिलक होती ही है कोई भी बने राजा।
श्री राम का राजतिलक अयोध्या नगरी में।
वनवासी लौटे हैं जब वनवास से नगरी में।
हर्षित हुए नगरवासी प्रमुदित ये देवलोक।
राजतिलक में सभी पधारे आशीषें हैं लोग।
इतिहास भरे पड़े राजतिलक के किस्से से।
कितने खूनी संघर्ष हुए हैं राज के हिस्से में।
राजतिलक जैसे होए नबाबों में ताजपोशी।
गद्दीनसीन होने पर होती उनमें ताजपोशी।
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
