जैसे ही ममता ने गाङी से रामचंद्र को उतरते देखा, उसका मन घ्रणा और क्रोध से भर गया। हमेशा इसकी बेटी को खुद की बेटी समझा। अगर मैं बेटी को नहीं पालती तो सब पता चल जाता। बच्चों की देखभाल एक औरत ही कर सकती है। आदमी में इतना दिल होता ही नहीं है कि वह बच्चों को पाल सके। शायद यही सोचकर ईश्वर ने आदमी को माॅ बनने का अधिकार ही नहीं दिया।
  दूसरों की तरह ममता को भी रामचंद्र से बङी हमदर्दी थी। बेचारा आदमी इतनी धन दौलत के बाद भी इतना दुखी है। जीवन में थोङी सी खुशियां आयीं तो औरत भगवान को प्यारी हो गयी। छोटी बेटी पर ममता को बङी दया आयी। ऊंच नीच तो बङों के मन के विकार हैं। बच्चे तो बस प्रेम जानते हैं। पर वीना बङा होकर भी बङी नहीं हुई। उसके मन में कोई ऊंच नीच नहीं आया तो इसमें मेरा क्या दोष। रामचंद्र की बेटी गुम हुई। उनका दुखी होना जायज है। पर मेरा तो बेटा और बेटी दोनों गुम हो गये। फिर मुझी को दोष। दोष तो छोटी बात है। इतने अमानवीय अत्याचार। नहीं नहीं। इसका तो मुंह देखना भी पाप है।
  
  एक तो बुढापा, दूसरा पुलिस की पिटाई के बाद से अक्सर उसके शरीर में दर्द होता था, ममता को उठने में थोड़ी देर हो गयी। इतनी देर में रामचंद्र ममता के पैरों में पङकर रोने लगे। 
   ” बहन। मुझे माफ कर दो। मुझसे बङी गलती हो गयी। ईश्वर मुझे कभी भी माफ नहीं करेगा।” 
  ” तो ईश्वर के भय से मेरे पास आये हों मालिक। क्या बात है। आपकी धन दौलत उनके दरवार में काम नहीं आयेगी। दोषी तो बस निर्धन होते हैं। धनियों का कोई दोष नहीं होता। धनी ही कानून बनाते हैं। वही धर्म भी बनाते हैं। कोई भूल चूक हो जाये तो उसे भी सुधार देते हैं। आखिर इतने धर्मानुष्ठान इसी लिये तो किये जाते हैं। मालिक… ।अब मेरे पैर छोङ दो। कोई आपको देख लेगा। आपपर फिर हसेगा। “
  ममता इतना पढी लिखी तो नहीं थी। कभी किसी ज्ञानी को अपना गुरु भी नहीं बनाया था। पर दुख के सागर में डूबे व्यक्ति को भला क्या गुरु की जरूरत। दुख तो खुद ज्ञान का स्रोत होता है। 
  ” बहन। मुझसे बङी भूल हुई। मेरे अपराध क्षमा करो। मुझे अच्छे परलोक की आशा नहीं है। मुझ जैसे पापी को तो नरक में भी जगह न मिले।” 
  ममता पर रामचंद्र की विनय का कोई फर्क न पङा। समय चक्र इतना बदल गया कि एक समय जो ममता जमीदार के सामने हाथ जोड़कर खङी रहती थी, आज जमीदार उसके सामने हाथ जोड़कर बैठा था। कभी रामचंद्र उसकी विनय पर ध्यान नहीं देते थे तो आज ममता की नजर में उनकी विनय का कोई मूल्य न था। ममता उदासीन भाव से चल दी। ममता जमींदार को मालिक तो बोल रही थी पर उन्हें मालिक मान नहीं रही थी। 
   ” बहन। वीना और रामू… ।आ गये हैं। इतने दिनों बाद।” 
  वैसे इस बात का कोई प्रमाण नहीं था कि रोहन और रंजना ही रामू और वीना हैं। पर रामचंद्र ने जिस विश्वास से यह कहा, ममता एकदम रुक गयी। फिर वहीं बैठ गयी। अब ममता रोने लगी। रामचंद्र भी नजदीक बैठ रोने लगे। बहुत देर तक दोनों रोते रहे। तब तक जब तक कि उन दोनों के मन का कलुष न बह गया। आंसू पोंछने के बाद ममता को रामचंद्र में अपना भाई दिखने लगा। कभी मालिक और सेविका के रूप बना रिश्ता, फिर भ्रम वश कट्टर दुश्मनी में बदलकर आज संसार के सबसे पवित्र प्रेम का रूप ले चुका था। आज रामचंद्र और ममता धर्म के भाई और बहन बन गये। यदि प्रेम का वर्गीकरण किया जाये तो भाई और बहन का प्रेम निश्चित ही माॅ और संतान के प्रेम के बाद अगले स्थान पर ही होगा। 
…………. 
    रोहन, महेश, रंजना और पल्लवी चारों दो दिन वृन्दावन में रूके। इस बीच अनेकों मंदिरों में घूमे। गैस्ट हाउस के मालिक रामचंद्र और उनकी बहन ममता ने उन्हें बहुत स्नेह दिया। उनकी हर व्यवस्था का ध्यान रखा। बच्चों को क्या चाहिये, यह बात ममता अच्छी तरह जानती थी। वही बच्चों को अनेकों स्थानों पर घुमाकर लायी। 
   अब उनके चलने का समय हो गया। बस दो ही दिनों में बच्चे उनसे ऐसा घुल मिल गये, मानों हमेशा से उन्हें जानते हों। 
   ” अंटी। आप तो बिल्कुल मेरी मम्मी जैसी हैं। बिलकुल मम्मी की तरह सब समझ जाती हैं।” 
  जब रोहन ने ममता से यह कहा तो ममता खुशी के मारे रोने लगी। फिर रोहन को गले से लगाकर आशीष देने लगी। चारों बच्चों को रामचंद्र और ममता बस में बिठाने आये। 
  ” बच्चों। फिर जल्दी आना। अभी एक बहुत सुंदर जगह तुम्हें घुमाने ले जाऊंगा। ऐसी जगह कि तुम खो जाओंगे।” 
  ” जरूर अंकल जी । अब कुछ महीने तो पढाई का जोर रहेगा। पर एक्जाम बाद जरूर आयेंगें।” 
  बच्चे बस में बैठ गये। पता नहीं अचानक रंजना को क्या हुआ। वह उतरकर आयी और रामचंद्र जी के गले लग गयी। कुछ ऐसा दृश्य बन गया कि बेटी अपने पिता से दूर जा रही है। 
   बस चल दी। रामचंद्र और ममता आंखों में आंसू भरकर बस को जाता देखते रहे। जब बस आंखों से ओझल लो गयी तो वापस गैस्ट हाउस के लिये चल दिये। 
  रोहन और रंजना आंखें बंद कर चुपचाप दो दिनों को याद कर रहे थे। इन दो दिनों में उन्हें न तो रंजना की पेंटिग का रहस्य पता चला और न रोहन के स्वप्न का रहस्य। पर एक अलग सुखद अनुभूति हुई जिसे वे खुद पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे। 
क्रमशः अगले भाग में….. 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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