माथे पर ये सजी हुई तेरी बिंदिया बड़ी सलोनी।
रूप तुम्हारा सजा है तू साजन की होने वाली।।
तेरी बिंदिया ये सुहाग की है एक बड़ी निशानी।
प्रियतम के सपनों की रानी पहने लगे सयानी।।
बिंदिया माथे पे लटकी चमचम लागे तू दीवानी।
सुंदर रूप तुम्हारा लागे साजन की तू मस्तानी।।
नींद चुरा लेती है तेरी बिंदिया उमंग भरे जवानी।
दो अजनवी के मेल खेल की जीवन की जानी।।
हर युवती का सपना होता सजे माथे पे बिंदिया।
रात-2 भर नींद न आती कब पहनूँगी बिंदिया।।
कब आएंगे साजन मेरे कब लाएंगे यह बिंदिया।
हर दुल्हन के लिए आए साजन घर से बिंदिया।।
नववधू स्वर्ण आभूषण पहने तो चमके बिंदिया।
गले में हार कान में झुमका उड़ा देतीहै निंदिया।।
हाथों में स्वर्ण कंगन पाँव में पायल एवं बिछिया।
सभी गहनों में अलग ही लागे गोरी की बिंदिया।।
गोरी के नयन कजरारे गोरे चेहरे में नाक नथिया।
उसपर गजब ही ढाए प्राण प्रिया की ये बिंदिया।। 
मनमें उठे हिलोर सजनी के हुई सुहागन बिंदिया।
साजन के संग सुखी रहे जीवन की नई बगिया।।
प्यार प्रेम विश्वास एक दूजे बिन आये न निंदिया।
मेरी बिंदिया रे तेरी बिंदिया रे ये तेरी ही बिंदिया।।
सुहागन कहाउँ मैं जीवन भर पहनूँ तेरी बिंदिया।
अमर सुहाग रहे मेरा चमकती रहे मेरी बिंदिया।।
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
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