माथे पे सजे जब बिंदिया तेरी,चंदा भी देख शर्मा जाए।
माथे पे गर बिंदिया न हो, श्रृंगार अधूरा रह जाए।।
जब नारी करे श्रृंगार सभी,
तब वो सुहागन कहलाती है।
खुद ही को देख आइने में ,
लज्जा से वो मर जाती है।
नजरें साजन की पड़ जाएं,
श्रृंगार ये पूरा हो जाए।
माथे पे सजे जब ब॔दिया तेरी,
चंदा भी देख शर्मा जाए।।
नारी को ये वर्दान मिला,
बिंदिया से आत्म सम्मान मिला।
देवों से लेकर मानव ने भी,
शक्ती को जिसकी जान लिया।
इस एक जन्म के बंधन को,
जन्मों से जन्म निभा जाए।
माथे पे सजे जब बिंदिया तेरी,
हर बंधन पीछे रह जाए।
पत्नी की शक्ती की प्रतीक,
सावित्री से मिलती है सीख।
सौभाग्यवती होकर ही तो,
थी पति को लाई यम से जीत।
श्रृंगार को कर,विश्वास को भर,
विधि के विरुद्ध चली जाए।
माथे पे सजे जब बिंदिया तेरी,
हर सुन्दरता फींकी पड़ जाए।।
माथे पे सजे जब बिंदिया तेरी, चंदा भी देख शर्मा जाए।
माथे पे गर बिंदिया न हो, श्रृंगार अधूरा रह जाए।
किरन सिंह
