वैसे तो अदालतें एक नहीं कई होती हैं।
प्रथम अदालत तो निज घर में होती हैं।।
ग्राम सभा से भी शुरू अदालतें होती हैं।
दीवानी की कई कई अदालतें होती हैं।।
एसीजेएम की ये कई अदालतें होती है।
सीजेएम की एक अदालत भी होती है।।
डिस्ट्रिक्ट जज की सबसे बड़ी अदालत।
जिला कलेक्टर की भी है बड़ी अदालत।।
जिले की कोर्ट कचहरी और ये अदालत।
सुनती सभी मुकदमे फैसला दें अदालत।।
मेट्रोपोलटीन मजिस्ट्रेट की भी है अदालत।
नारकोटिकस की भी अपनी है अदालत।।
सीबीआई की भी होती है अपनी अदालत।
सेना की भी अपनी होती है एक अदालत।।
ट्रायलकोर्ट मानवाधिकार कोर्ट भी होती हैं।
राजाओं की भी तो अपनी अदालते होती हैं।
खाप पंचायतों की भी होती एक अदालत।
जानता जनार्दन की भी होती है अदालत।।
संतुष्टि हेतु ही राज्य की हाईकोर्ट अदालत।
अलग अलग है बेंच वहाँ की भी अदालत।।
ऐसे ही ये और भी कितनी होती हैं अदालतें।
उपभोक्ता फोरम की भी तो होती अदालतें।।
देश की सुप्रीमकोर्ट है सबसे बड़ी अदालत।
जहाँ फैसलों को फिर सुने न कोई अदालत।।
यद्यपि कि इन अदालतों में तारीखें हैं पड़ती।
एक नहीं कई कई साल तक रहती हैं पड़ती।।
कई कई पीढ़ी तक चलें मुकदमें अदालत में।
जल्दी न्याय नहीं मिल पाता दौड़ें अदालत में।।
सबसे बड़ी आखरी एक ही अदालत है होती।
ईश्वर की ये अदालत है वहाँ भी फैसला होती।।
प्रभु की अदालत का कोई वकील नहीं होता।
खुद ही ईश्वर है वकील व जज भी वही होता।।
देख रहा होता है सब कुछ धर्मराज की दृष्टि से।
कोई भी बच नहीं सका है उसकी पैनी दृष्टि से।।
उसका फैसला ऐसा होता जो सब करें स्वीकार।
उसमें कोई अपील नहीं है करना ही है स्वीकार।।
बुरे कर्म को छोड़ अभी से सद्कर्मो का प्रण लें।
जो कुछ बचा है जीवन उसमें सुंदर कुछ कर लें।।
मेरी दृष्टि में इससे बड़ी न आखरी कोई अदालत।
यही है भैया आप माने सच्ची आखरी अदालत।।
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
