दीवारें तो बेजुबान
निर्जीव की संज्ञा पाती
कैसे सुन सकती है
कब सुना सकती है
लगता तो नहीं
कर्ण और जुबान तो
सजीवों की निशानी
दीवार की तो नहीं
सच कुछ अलग है
अधिक गहरा
कभी चलती आंधियां ख्यालों की
उड़ जाते वे पर्दे
जिनपर था यकीन अधिक
छिपा रखेगें मन को महफूज
दीवार तो यों ही बदनाम हैं
असली खिलाड़ी हैं वे आंधियां
छिपता नहीं जिनसे कुछ भी कहाॅ
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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