धूल में भी फूल होते हैं
पहचान को मोहताज
अस्तित्व बचाने को संघर्षरत
तरु की डाली से टुट गिरे
या तोड़े गये
बड़े नेता की अगुआई में
खुद मिल गये धूल में
कितनी बार सनते कीच में
कभी पैरों से कुचलते
टुकड़े टुकड़े होते
कौन परवाह करता
आखिर धूल के फूल जो हैं
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
