यह जो सो रहा है 
अनेकों परिजनों से घिरा
रुदन की ध्वनि भी न सुनता
गूंज रही धरा
गूंज रहा आसमान
और यह सो रहा है
कभी जो मालिक था
कोठी और धन दौलत का
आज उसकी कोठी बट रही है
दौलत के टुकड़े हो रहे
और यह सो रहा है
यह बेशुमार दौलत
कब मिली आसानी से
दिन और रात मिटा दी
आज दौलत बट रही है
और यह सो रहा है
यह इसका खुद का घर
इसके खून पसीने से निर्मित
आज इसका घर बदल रहा है
श्यमशान पहुंचाया जा रहा
और यह सो रहा है
परिजनों के रुदन में
कितने गुप्त हास्य
धन, दौलत और आजादी की चाह
आज पूरी होगी
और यह सो रहा है
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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