आसमान में तारों की विदाई के साथ ही दिव्या की भी विदाई हो गयी। सभी जगह अलग अलग परिपाटी है। दिव्या के ससुराल बाले इस बात पर ज्यादा दृढ थे कि विदा तारों की छांह में ही हो। दिव्या के पिता ने नाश्ता बगैरह की पेशकश की। पर उन्हें जल्दी थी। आखिर विदा में भी समय लगता है। दिव्या से सब मिल रहे थे। पर मम्मी कुछ दूर खड़ी थी। आज तक दिव्या की नजर में साधना उसके पिता की दूसरी पत्नी थी। फिर भी लोकाचार के लिये ही सही, कुछ दिखावा तो करना चाहिये।
” अपना ध्यान रखना।” इतना ही बोलकर साधना पीछे हट गयी। चलो कुछ तो नाटक किया। दिव्या की गाड़ी आसमान से बातें कर रही थी। सफर दूर था। रात भर विवाह में सो भी नहीं पाये थे। दिव्या की आंखें बंद होने लगीं।
” नींद आ रही है क्या? आराम से सो लो। अभी बहुत समय लगेगा।” विपुल के बोलने के साथ ही दिव्या आंख बंद आराम करने लगी। वैसे रास्ते में गड्ढे बहुत थे। बार बार नींद उचट जाती। पर जल्द ही हाई वे पर गाड़ी दोङने लगी।
विपुल, दिव्या का प्रेमी था। उसकी हैसियत दिव्या के सामने कहीं नहीं थी। इसलिये उसने प्रेम का इजहार नहीं किया। बल्कि खुद दिव्या ने उसे अपना जीवन साथी चुना। विपुल की खुशी की सीमा न थी।
सोते सोते दिव्या बहुत दूर पहुंच गयी। दस साल की बच्ची इतनी छोटी नहीं होती कि अपना पराया न जाने। एक दिन पापा ने बोल दिया कि ” बेटा, अंटी आज से तुम्हारी मम्मी हैं।” पर दिव्या ऐसे कैसे मान ले। उसे याद था कि आज से तीन साल पहले दिव्या की माॅ बीमारी में गुजर गयी थी। दिव्या भी बहुत रोई थी उस दिन।
दिव्या पिछले तीन साल से पापा के साथ सोती आ रही थी। पर अब बहुत बदल गया था। साधना ने दिव्या को बेटी माना या नहीं पर दिव्या कभी साधना को माॅ नहीं मान पायी। साधना उसकी सोतेली माॅ बन गयी।
सौतेली माॅ जो बच्चों को प्रताडित करती है। सौतेली माॅ जो बच्चों से उनके पिता को भी छीन लेती है। पर आज दिव्या याद करके भी याद नहीं कर पा रही थी कि साधना ने उसे कभी फटकारा हो। हाॅ यह सही है कि साधना ओर दिव्या में ज्यादा बात नहीं होतीं। और जब भी बात होती तो बहस से ही खत्म होती।
” बेटी..।मैं तुम्हारी माॅ हूं। तुम्हारे भले के लिये ही कुछ बोलती हूं ।”
” मेरी चिंता मत किया करो। मैं कोई दूध पीती बच्ची नहीं हूं। वैसे भी तुम मेरी माॅ नहीं हो।”
दिव्या याद कर रही थी कि उसके और साधना के बीच इतनी बहस हुई थी। दिव्या की सहेली ने रोक लिया था। रात घर आने में देर हो गयी थी। वैसे रास्ते में खुद दिव्या घबरा रही थी पर साधना का सलाह देना उसे अखर गया।
रास्तें में गाङी मुड़ी । दिव्या की नींद टूट गयी। पर विपुल अभी सो रहा था। वैसे तो दिव्या ने विपुल को कितनी बार देखा था। पर आज वह ज्यादा प्यारा लग रहा था। जिसे बड़ी मेहनत से पाया जाये, वह ज्यादा प्यारा ही होता है। अगर विपुल उसकी जिंदगी में न आता तो भला वह कैसे जी पाती। जी भी लेती तो शायद वह जिंदगी मौत से कम न होती।
” दिव्या…। तुममें बचपना है। शादी हमेशा बराबर बालों में की जाती है। आखिर उस लड़के की हैसियत ही कितनी है। मेने तुम्हें बङे प्यार से पाला है। तुम उसके घर में निभ भी नहीं पाओंगीं।” पापा के मना करने के बाद दिव्या कितना रोई। पर ईश्वर को उसका और विपुल का साथ मंजूर था। शायद इसीलिये पापा ने फिर उसकी पसंद पर विचार किया। दिव्या की आंख से कुछ अश्रु निकल आये। आज वह विपुल को अपलक निहार रही थी।
” अरे… ।कितनी देर हो गयी सोते सोते। दिव्या…। तुम्हें चाय तो नहीं पीनी।” विपुल की नींद उचट गयी थी। दिव्या ने हाॅ में मुंह हिला दिया। एक ढाबा के नजदीक कार रुक गयी। ड्राइवर वहीं चाय ले आया। दोनों चाय की चुस्की से थकान मिटाने लगे। फिर कार आगे बढ ली।
सचमुच विपुल का घर बहुत छोटा था। नीचे दो कमरे, रसोई, आंगन, बाथरुम बने थे। पर ऊपर एक बड़ा कमरा, अटैच्ड बाथरूम अलग बना था। कोई भी बता सकता था कि ऊपर बाला कमरा अभी जल्दी में बना है।
दिव्या ने इतना छोटा घर कभी देखा नहीं था। दिव्या के घर में तो बाथरूम ही इतने बङे थे। पर विपुल के घर के बाथरूम में दिव्या को लगा कि कैसे नहाये। रसोई भी बहुत छोटी सी थी। पर सभी उसे बड़ा प्रेम करते थे। सभी दिव्या का बड़ा ध्यान रखते। शायद यह प्रेम ही था कि अब दिव्या को कोई परेशानी नहीं होती थी।
………….
दिव्या चाय बनाकर सासू माॅ के कमरे में जा रही थी। अचानक दरबाजे के बाहर रुक गयी। सासू माॅ किसी से फोन पर बात कर रहीं थीं।
” बहन जी। मैं तो हमेशा यही सोचती थी कि सौतेली माॅ बच्चों से प्रेम नहीं करती। पर आपने जो किया, वह शायद कोई सगी माॅ भी न कर सके। न केवल भाई साहब को आपने राजी किया। हमें भी आपने विश्वास दिलाया कि आपकी बेटी हमारे घर में निभ जायेगी। अगर विपुल और दिव्या एक हो पाये तो उसकी बजह केवल आप ही हैं। आप दिव्या की सौतेली माॅ हैं पर सगी माॅ से कहीं कम नहीं। “
आज दिव्या की आंखों से आंसुओं की धारा निकलने लगी। दिव्या अपनी माॅ के गले से लगकर रोने के लिये वैचेन हो गयी।
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
