बरसो बीत गए ,
तेरी बेवफ़ाई को,
लेक़िन ज़ख्म आज भी ताजा है।
जब भी बात चलती है तेरी ज़माने में
मेरी आँखें मेरा हाल कह जाती है।।
खिलाड़ी था बड़ा तू,
मुहब्बत के बाजार में,
एक हम ही नादाँ थे,
जो तुझे मुहब्बत का,
खुदा समंझ बैठे थे।।
दुआओं में सिर्फ़ मुहब्बत माँगा था,
लेकिन मेरी किस्मत को ये भी मंजूर न था,
साथ दिया तेरा पल तो पल का,,,,
ता-उम्र की कसक मेरे नाम किया।।
नही दूँगी तुझे कोई इल्ज़ाम बेवफ़ाई का,
सारा कुसुर तो हमारा था,
लगाया दिल उस फ़रेबी से,
दिल्लगी जिसकीं फ़ितरत में था।।
हँसी आती है मुझे अब,
किस्मत की दग़ाबाज़ी पर,
आज फिर उसे साथ लेकर लौटी है,।।
सुना है!!
सज़ा की ख्वाईश लेकर आया है वो,
ये बात जमाने को पता है,
लेकिन कैसे माफ़ करुँ उसे,
जिसने हर पल मुझे छला था।।
