खिल उठी फिर से वसुंधरा,
यौवन का विस्तार हुआ,
डाली-डाली खिले सुमन,
प्रकृति ने श्रृंगार किया।
शीत ऋतु की शीतलहर से,
सहमी थी तरु की तरुणाई,
पाकर रवि की रश्मि को,
नव चेतना का संचार हुआ।
खेतों में लगी पीली सरसों,
लगती धरा की बिंदी सी,
सिंदूर लगे सूरज की लाली,
दुल्हन सी धरा का सत्कार हुआ।
नीड़ में सोए पंछी चहके,
भवरों का मन फिर से बहके,
नीरव नैना खोजे पी को,
बसंत का जब दीदार हुआ।
स्वरचित रचना
रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
