अश्रुपूरित नयन लेकर,
दे रहे अंतिम विदा सब।
रुग्ण काया से मुक्त हुए हो,
जाते अब परलोक धाम।
परमसत्ता आशीष दे रही,
पहुँचे तुम गोलोक, विदा है।जिंदादिल जिंदा हो दिल में,
हँसते रहना तुम्हें विदा है,
गाँव शहर ये याद करेगा,
बस खुश रहना, तुम्हें विदा है।
जाओ चंद्र खिलौना ले लो,
खेलो तुम स्वछंन्द, विदा है।
मगन रहो तुम ,नील गगन में,
वहीं तेरा संसार, विदा है।
करुण स्वरों से व्यथित न होना,
दो दिन का है राम,विदा है।
सारे बंधन टूट चुके अब,
हो निर्बन्धित आज, विदा है।
दो पल का यह जीवन सारा,
बीत गए पल आज,विदा है।
चलती किसकी उसके आगे, मर्जी उसकी यही, विदा है।किसकी चिंता कैसी चिंता, सबका रक्षक वही, विदा है।
सब हो जाएगा खुद ही अब, कर्त्ता- धर्त्ता वही, विदा है।
दुख में दुखी न सुख में हर्षित,
सुख-दुःख के समभाव,विदा है।
जब भी देखा हँसते देखा, खुशियों का संसार, विदा है।अपने मन की सुनी सदा ही, लोगों की दुत्कार, विदा है,
अपमानित न किया किसी को, तेरा सदव्हवहार, विदा है।
जिया तू अपनी ही मस्ती में, मस्ती के सरताज विदा है।
न कुछ लेना, न कुछ देना,
जुदा तेरा अंदाज, विदा है।
जैसे जीवन जिया सदा ही,
वैसे करो प्रस्थान , विदा है।
अब गोलोक वास हो तेरा,
मिले उचित स्थान, विदा है।
छोड़ गए छाप तुम ऐसी,
जिसकी कोई नहीं मिसाल।
देते हैं सब द्रवित हृदय से,
विदा ले चले गए स्वधाम।
रचयिता –
सुषमा श्रीवास्तव
उत्तराखंड।
