जैसे जैसे नैना की शादी के दिन नजदीक आ रहे थे, राज सिंह जी के काम बढते जा रहे थे। बेटी का विवाह और मकान का निर्माण दो ऐसे काम हैं जिन्हें कितना भी अच्छी तरह करो, कुछ कमी रहती है। इकलौती बेटी के विवाह में राज सिंह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण भेजने के साथ साथ फोन पर भी सूचित कर रहे थे। जानते थे कि ज्यादातर रिश्तेदार नैना के अंतर्जातीय विवाह के कारण नाराज हैं। वैसे भी अनेकों रिश्तेदार बहुत पहले नैना के लिये रिश्ते बताते रहे थे। जिसे राज सिंह विनम्रता पूर्वक मना करते रहे थे। इस समय राज सिंह सभी रिश्तेदारों की नाराजगी दूर करना चाहते थे जो वास्तव में एक असंभव सा उपक्रम था। 
  दूसरी तरफ वरुण के परिजन भी इस रिश्ते से अधिक प्रसन्न नहीं थे। वरुण के दृढ निश्चय के कारण भले ही वे नैना को स्वीकार करने को तैयार हो गये हों पर सत्य है कि मन के विकार कभी भी आसानी से मिटते नहीं है। नैना की शादी में अपनी पूरी सामर्थ्य से भी बढकर दान दहेज की व्यवस्था कर, बारात का बेहतरीन स्वागत कर राज सिंह जी नैना के ससुराल बालों की नाराजगी को प्रसन्नता में बदलना चाहते थे। वैसे भी संसार में अधिकतर विवाद माता लक्ष्मी के ही कारण होते हैं। तथा माता लक्ष्मी बड़ी से बड़ी नाराजगी को प्रेम में बदल देती है। सुख और दुख तो ईश्वर के आधीन हैं। पर पिता के रूप में अपनी बेटी के जीवन में खुशियां लुटाने में राज सिंह जी कमजोर नहीं पड़ना चाहते थे। ईश्वर से यही प्रार्थना करते थे कि ससुराल में बेटी सभी का प्रेम पाये। प्रेम बांटने पर ही मिलता है। इस सिद्धांत को स्वीकार करते हुए अक्सर वह नैना को भावी जीवन में ससुराल में सभी के मान सम्मान की शिक्षा देते थे। हालांकि एक सत्य यह भी था कि इस समय वह विचलित भी थे। एक तो बेटी की विदाई नजदीक थी। दूसरा बेटी के भविष्य की चिंता में राज सिंह जी का विचलित होना अपरिहार्य था।
   नैना की सगाई बड़ी धूम धाम से हुई। इस समय तो नैना के ससुरालीजन बड़े प्रेम से मिले। नैना के लिये मंहगे उपहार भी लेकर आये। यह दूसरी बात थी कि राज सिंह जी ने भी सभी को भारी भेंट दीं। लगा कि भेंट की अधिकता ने स्नेह की भी धारा प्रवाहित कर दी।
   राज सिंह भले ही नैना को पुरातन काल से चली आ रही शिक्षा देते। ससुराल में सभी का सम्मान करना। पति, सास, ससुर की हर बात मानना। यदि कभी कोई बात खुद के प्रतिकूल भी हो तब भी सहर्ष स्वीकार कर लेना। बेटियां झुककर हमेशा पितृकुल और पति कुल दोनों का मान बढाती हैं। इसीलिये बेटियों को इतनी ज्यादा जिम्मेदारी दी जाती है।
  पर दूसरी तरफ वह अपनी ही शिक्षा की समीक्षा भी करने लगते। क्या पत्नी को पति की हर बात माननी चाहिये। क्या जब पति की बात पूरी तरह अनुचित हो, उस समय भी क्या उसे पतिभक्ति प्रदर्शित कर चुपचाप गलत को स्वीकार करना चाहिये। क्या ऐसा कर पत्नी अपने पति को खुश रखती है। नहीं। बिलकुल नहीं। यदि रमा गलत का प्रतिवाद करती तो शायद यह न होता। शायद दो वर्ष की बेटी अपनी माॅ से न बिछुड़ती। शायद मेरे प्रेमी हृदय को वियोग न सहन करना पड़ता। शायद रमा के विरोध न करने के कारण ही मेरा जीवन दुखों की सरिता में इस कदर न डूबता।
   मेरी और रमा की प्रीति को जो गाथा समाज जानता है, उसमें कितना सत्य है। एक मैं अपने पुरुषत्व के अहम में रमा की जरूरत को भी अनदेखा करता रहा। दूसरी तरफ रमा भी आदर्श पत्नी बनी कभी विरोध न कर मेरे जीवन से ही दूर चली गयी। क्या यही प्रेम है। नहीं। बिलकुल नहीं। इस प्रेम कहानी के भवन की तो दीवारें ही पत्नी के सहर्ष स्वीकृति तथा पति के अधिकार रूपी छिद्रों से खोखली बनी हुई हैं।
   मेरा दुबारा विवाह न कर केवल नैना को पालन पोषण में अपना जीवन लगा देना, बस इसी से तो मेरे प्रेम का परिचय नहीं हो सकता है। वास्तव में यह एक प्रायश्चित ही तो है जो इतने वर्षों से मैं चुपचाप कर रहा हूं। पर अब लगता है कि चुप्पी तोड़ने का समय आ गया है। अब जबकि नैना अपनी गृहस्थी की शुरुआत करने जा रही है, उस समय उसे सच बताना चाहिये। ताकि वह वही भूल न दुहराये जो उसकी माॅ ने की थी। अब नैना को सचेत करने का अवसर आ चुका है।
क्रमशः अगले भाग में 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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