मेरी पतंग है मेरे ठाकुर जी के हाथ।
मेरे ठाकुर जी रहते हैं मेरे साथ साथ ।।
मन मर्जी उनकी चलती मै जोडे़ रहती हाथ।
कभी ऊँची गगन उडा़ते कभी धरा पर जात।।
मेरी तो लगती अर्जी और ठाकुर जी की मर्जी सब कुछ उनके हाथ।
आशा की जीवन डोरी राघव चरनन सें जोरी हैं साथ साथ रघुनाथ।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर
