बम कांड पर सेशन कोर्ट में बयान (द्वितीय पार्ट) –
हम इन्हीं प्रश्नों तथा मजदूर आंदोलन के नेताओं की धरपकड़ पर विचार कर ही रहे थे कि सरकार औद्योगिक विवाद विधेयक लेकर सामने आई। हम इसी संबंध में असेंबली की करवाई देखने गए। वहां हमारा यह विश्वास और भी दृढ़ हो गया कि भारत कि लाखों मेहनतकश जनता एक ऐसी संस्था से किसी बात की भी आशा नहीं कर सकती जो भारत की बेबस मेहनतकश ओं की दास्तां तथा सोच को की  गला घोटु शक्ति के हितकारी यादगार है ।
अंत में वह कानून जिसे हम बर्बर एवं अमान्य समझते हैं देश के प्रतिनिधियों के सर्वर पर पटक दिया गया और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत भूखे मजदूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनके हाथों से उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्र हथियार भी छीन लिया गया। जिस किसी ने भी कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मुख्य मेहनत करो कि हालात पर हमारी तरह सोचा है वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा। बलि के बकरों की भांति सोच को और सबसे बड़ी सोशल स्वयं सरकार है कि बलिवेदी पर आए दिन होने वाली मजदूरों की इन मुख कुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता है वह अपनी आत्मा की चितकार की उपेक्षा नहीं कर सकता।
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी समिति के भूतपूर्व सदस्य स्वर्गीय श्री एस. आर. दास ने अपने प्रसिद्ध पत्र में अपने पुत्र को लिखा था कि इंग्लैंड की स्वप्न निद्रा भंग करने के लिए बम का उपयोग आवश्यक था। श्री दास के इन्हीं शब्दों को सामने रखकर हमने असेंबली भवन में बम फेंके थे। हमने वो काम मजदूरों की तरफ से प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिए किया था। उन असहाय मजदूरों के पास अपने मरमंतक  क्लेश ओ को व्यक्त करने का और कोई साधन भी तो नहीं था। हमारा एकमात्र उद्देश्य था “बहरो को सुनाना”और उन पीड़ितों की मांगों पर ध्यान ना देने वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना।
हमारी ही तरह दूसरों की भी परोक्ष धारणा है कि प्रशांत सागर रुपी भारतीय मानवता की ऊपरी शांति किसी भी समय फूट पड़ने वाले एक भीषण तूफान की घोतक है। हमने तो उन लोगों के सिर्फ खतरे की घंटी बजाई है जो आने वाले भयानक खतरे की परवाह किए बगैर तेज रफ्तार से आगे की तरफ भागे जा रहे हैं। हम लोगों को सिर्फ यह बता देना चाहते हैं कि काल्पनिक अहिंसा का युग अब समाप्त हो चुका है । और आज की उठती हुई नई पीढ़ी को उसकी व्यर्थता  में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं रह गया है।
मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमित प्रेम रखने के कारण उसे व्यक्ति के रक्त बात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया है। और उस आने वाले रक्तपात को हम ही नहीं लाखो आदमी पहले से ही देख रहे हैं।
काल्पनिक अहिंसा –
ऊपर हमने कल्पनिक अहिंसा शब्द का प्रयोग किया है। यहां पर उसकी व्याख्या कर देना भी आवश्यक है। आक्रमक उद्देश्य से जब बल का प्रयोग होता है उसे इंसान कहते हैं और नैतिक दृष्टिकोण से उसे उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब उसका उपयोग किसी वैध आदर्श के लिए किया जाता है तो उसका नैतिक और चित्र भी होता है। किसी हालत में बल प्रयोग नहीं होना चाहिए यह विचार काल्पनिक और व्यवहारिक है। इधर देश में जो नया आंदोलन तेजी के साथ उठ रहा है और जिसकी पूर्व सूचना हम दे चुके हैं वह गुरु गोविंद सिंह ,शिवाजी कमाल पाशा ,रिजा खान, वाशिंगटन, गैरीबाल्डी लफायत और लेनीन आदर्शों से ही प्रस्फूरितहै और उन्हीं के पद चिन्हों पर चल रहा है। क्योंकि भारत की विदेशी सरकार तथा हमारे राष्ट्रीय नेता गन दोनों ही इस आंदोलन की ओर से उदासीन रखते हैं और जानबूझकर उसकी पुकार की ओर से अपने कान बंद करने का प्रयत्न कर रहे हैं अतः हमने अपना कश्यप साझा कि हम एक ऐसे चेतावनी दे जिसकी अवहेलना की जा सके।
क्रमशः
गौरी तिवारी 
भागलपुर बिहार
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