दो ऑंचल के कोने में जब लगती गांठ।
दुख-सुख दोनों बराबर लेते बाॅंट।
यहीं तो कहलाता है गठबंधन।
जिससे जुड़ता है प्रणय का बंधन।
अग्नि की परिक्रमा करता ये बंधन।
सात वचन की लेन-देन ये बंधन।
इसके बिना संभव नहीं प्रणय।
यह रोके आने से अशुभ प्रलय।
गांठ को ना समझो नहीं मामूली।
यह मानों भगीरथ जल में धूली।
चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण
