मेरी स्थिति एक लुटे हुए व्यापारी जैसी हो रही थी, जिसका सब कुछ आंखों के सामने ही लुट रहा हो। कई बार मन हुआ कि घर बालों को वर्तमान रिश्ते के लिये मना कर दूं। पर एक बात मुझे बार बार रोक देती थी। आखिर किस कारण से मना कर पाऊंगा। जिस लड़की को मैं मन ही मन पसंद कर रहा था, वह कौन थी, मुझे पता ही नहीं था। वैसे भी सभी की अलग अलग पसंद होती है। उस लड़की के घर बालों की नजर में मेरी क्या स्थिति रही होगी, इस बात से अनजान था।
   लगता था कि एक बार भाभी जी से बात की जाये। उस लड़की के बारे में पूछा जाये। पर न जाने क्यों हिम्मत जबाब दे जाती। वैसे एक सत्य यह भी था कि घर बाले कभी भी अपनी तरफ से किसी लड़की के लिये रिश्ता भेजने को तैयार न होते। सम्मान की परिभाषा में अक्सर कन्या पक्ष द्वारा इन्कार की संभावना से बचने के लिये ऐसा ही चलन था। कहावत बन गयी थी कि लड़का बाले इसी विषय में लड़की बालों से कमजोर होते हैं। जहाँ एक लड़की बाला दुनिया भर में अपनी लड़की के अनुरूप वर तलाश सकता है। वहीं लड़के बालों को उन्हीं कन्याओं में से चयन करना होता है, जिनका रिश्ता आया है।
   धीरे धीरे शादी का दिन आ गया। अनेकों रिश्तेदारों से घर भर गया। बरात की रवानगी होने लगी। हम सभी कन्या पक्ष के घर तक पहुंच गये। लगता नहीं कि ऐसी खुशी के अवसर पर कोई उदास होगा। पर तमाम महफिल में मैं चुपचाप रो रहा था। अपने आंसुओं को भीतर ही भीतर पी रहा था।
  वह गुलाबी सूट बाली लड़की मेरे मन के भीतर तक इस तरह व्याप्त थी कि लग रहा था कि उसे भुला पाना संभव नहीं है। फिर एक अन्य चिंता मन को खा रही थी कि कन्हीं मैं अपने उस प्रेम के लिये जिसका पूर्ण सत्य ही मुझे ज्ञात नहीं था, अपनी होने बाली पत्नी के प्रति पूर्ण न्याय कर पाऊंगा। कहीं एक कन्या मेरी अज्ञात प्रेम गाथा के कारण मेरी उपेक्षा का शिकार तो नहीं बन जायेगी।
   मैं धीरे धीरे उस गुलाबी सूट बाली लड़की को मन से निकाल उस स्थान पर अपनी पत्नी की काल्पनिक तस्वीर को रख रहा था। जिस लड़की से मेरी शादी होने जा रही थी, उसकी तो तस्वीर भी मैंने नहीं देखी थी। फिर कल्पना से उस समय अपनी खूबसूरती के लिये विख्यात अनेकों बालीबुड की अभिनेत्रियों जैसी कन्याओं की छवि भी बराबर बैठाने के बाद भी उस गुलाबी सूट बाली लड़की की तस्वीर मानस से हट नहीं रही थी।
  मेरी उदासी उस समय तक रही जब तक कि जयमाला का कार्यक्रम आरंभ नहीं हुआ। इस समय मैं पहली बार उस कन्या से मिलने जा रहा था जिसके साथ मुझे जीवन का सफर तय करना था। स्टेज पर मैं उसका इंतजार कर रहा था कि सामने से मैंने अपनी दुल्हन को जयमाला लिये आते देखा। दुल्हन को देखते ही मैं अपनी सुध बुध भूल गया। वैसे संजी संवरी हर दुल्हन सुंदर लगती ही है। पर बहुत समय से जबरदस्ती जिन विभिन्न फिल्मी तारिकाओं की छवि मन में बसा रहा था, वे सब एक झटके में मिट गयीं। फिर मेरे मन में केवल वही लड़की रह गयी जिसे मैं चुपचाप प्रेम करता था और जो उस समय भी मेरे सामने अपने हाथों में जयमाला लिये आ रही थी। अपने नैत्र झुकाये, महरून और गुलाबी रंग का मिश्रित लंहगा पहने आज तो वह बहुत ज्यादा सुंदर लग रही थी।
क्रमशः अगले भाग में 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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