स्कूल के पहले दिन की स्मृति तो मष्तिष्क पटल पर अब शेष नहीं है लेकिन प्राथमिक विद्यालय के शुरूआती माहौल की कुछ धुँधली सी यादें अभी भी बची हुईं।
ना जाने कितने सालों से इस विषय पर कभी विचार ही नहीं किया, आज फ़ुरसत में जिंदगी के उन गुज़रे लम्हों को फिर से जी लेने की ख्वाहिश जाग उठी।
गाँव का वो प्राथमिक विद्यालय, जिस भवन को प्राथमिक विद्यालय में रूपांतरित कर दिया गया था, वो वास्तव में गांव के पंचायत घर की इमारत थी, अब ना तो कोई पंच परमेश्वर थे गाँव में और अब ना ही गाँव में कोई पंचायत होती थी, अब मामला या तो सीधा थाने में जाता था या अदालत में।
प्राथमिक विद्यालय की ये पुरानी इमारत गाँव से थोड़ा सा बाहर की तरफ थी, चौकोर आकार का बड़ा सा खेलकूद का मैदान, जिसमें सबसे पहले सरकारी हैंडपंप लगा हुआ था, वैसे तो ये हैंडपंप स्कूल के बच्चों को पानी पीने के लिए लगा हुआ था लेकिन इसका मूलरुप उपयोग पड़ोस के घरों के पुरुषों के नहाने और उनके जानवरों को पानी पिलाने के लिए किया जाता था।
विद्यालय का खेलकूद मैदान जो बच्चों के खेलने के लिए था, उस पर लगभग ८०℅ गाँव के लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था, जिसका उपयोग उन्होंने जानवरों को बाँधने, उनके गोबर से निर्मित उपलों को रखने और सुखाने के लिए कर रखा था, हेडमास्टर के कुछ बोलने पर उनको धमकी देकर चुप करा दिया जाता था।
पीली रंग से पुती हुई वो पुरानी इमारत जिसके बाहर काले रंग से बडे-बड़े अक्षरों से लिखा हुआ था
प्राथमिक पाठशाला ग्रान-मानिकपुर
वि.ख. सुल्तानगंज
(मैनपुरी)
मुझे काफ़ी समय तक ये वि. ख. मतलब ही समझ में नहीं आया, कई वर्षों के पश्चात मालूम हुआ कि वि.ख. का अर्थ विकास खण्ड था।
कुल विद्यालय में ३ कमरे थे, एक सामने और दो दाएं और बाएँ और बरामदा, किसी भी कमरे में खिड़की नहीं थी, रोशनी के लिए कमरा बनाते समय खिड़की के आकार में बीच-बीच से ईंटों को निकाल दिया गया था।
हर कमरे के दरवाजे के ऊपर नैतिक शिक्षा से सम्बंधित वाक्यों को लिखा गया था जैसे कि;
जीवों पर दया करो
अहिंसा सर्वोत्तम धर्म है
सदा सच बोलो
कठिन परिश्रम सफलता की कुन्जी है
मेरा भारत महान
अपने से बड़ों का सदैव सम्मान करें इत्यादि।
हालाँकि उस समय मुझे सच में इन शब्दों का मतलब ही नहीं पता था, विद्यालय के बाहर दो गूलर के छोटे-छोटे पेड़ लगे हुए थे, बगल में एक आंवला का पेड़ था।
लड़कियों का ज्यादातर समय आंवले इकठ्ठे करने और उनको खाने में व्यतीत होता था।
कुल मिलाकर विद्यालय की इमारत अंग्रेजों के शासन काल की बची हुई स्मृति जैसी थी।
विद्यालय में कुल ४ शिक्षक थे, एक हेडमास्टर और तीन सहायक अध्यापक, इस समय शिक्षकों का नाम तो हमारे अभिभावकों को भी पता नहीं होता था लेकिन शिक्षकों की पहचान उनके उनके गांव या क्षेत्र से मिलती थी।
हेडमास्टर जिन्हें आलीपुर वाले मास्साब
पहले सहायक अध्यापक जिन्हें बमबिया वाले मास्साब
दूसरे सहायक अध्यापक जिन्हें गढ़िया वाले मास्साब
तीसरे सहायक अध्यापक जिन्हें भी आलीपुर वाले मास्साब के नाम से विद्यालय ही नहीं पूरे क्षेत्र में संबोधित किया जाता था।
स्वभावगत विशेषतायें भी उन शिक्षकों को अलग पहचान देती थीं, उस समय उनके पढ़ाने का तरीका आज के समय में शारीरिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है।
स्कूल बैग जैसा शब्द हमको पता ही नहीं था, घर का सिला हुआ कपड़े या बोरी का सिला हुआ थैला, जिसमें एक पट्टी, एक खड़िया की बोतल, एक या दो क़लम।
पट्टी साफ़ करने के लिए घास के हरे पत्तों का उपयोग सामान्य था।
बैठने के लिए टाट-पट्टी मिलती थी।
उस समय विद्यालय में जाना मुझे बहुत भयानक लगता था, शरीर में एक अजीब सी सिरहन दौड़ जाती थी, विद्यालय जाके एक अजीब सा डर एक अजीब सी घुटन महसूस होती थी, मानो किसी क़ैदखाने में बन्द कर दिया गया हो।
सुबह चूर्ण बेचने वाले का आना और फिर लगातार बजने वाली इंटरवल की घण्टी ही उस समय सबसे अच्छी लगती थी।
कभी कभी क्या ज्यादातर खाने के बाद के बाद विद्यालय में पुनः जाना असहनीय था।
कभी-कभी तो विद्यालय के बहाने किसी बाग-बगीचे में पूरा दिन काट कर आ जाते थे।
सच कहूँ तो उस समय सरकारी स्कूलों में पढ़ाने और बच्चों के साथ किया जाने वाला व्यवहार बहुत ही भयानक था, जो बच्चों के कोमल मन पर एक आतंक की एक ऐसी रेखा खींच देता था जिसे मिटाने में उन्हें वर्षों लग जाते थे।
शिक्षक बच्चों से व्यक्तिगत काम कराते और व्यक्तिगत जरूरत की चीजें भी उनके घर से मंगा लेते थे।
शिक्षकों का मानसिक रूप से कमजोर, छोटी और अछूत बच्चों के साथ किया जाने वाला भेदभावपूर्ण व्यवहार उन बच्चों को उस समय स्कूल छोड़ने पर विवश कर देता था।
अभिभावकों का उदासीन रवैया भी उस समय बच्चों को मानसिक पीड़ा देने जैसा था, वो बस स्कूल जाके बोल आते थे आप ही देख लो।
अंत में इतना ही उस समय बच्चों का प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करना सच में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलने से कम नहीं था।
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
