आज एक विशेष व्यक्तित्व भारत कोकिला/ भारतीय बुलबुल “श्रीमती सरोजिनी नायडू” की 143 वीं जयंती है।उन्ही श्रद्धेया की स्मृति में यह आलेख प्रस्तुत कर रही है।संभव है आप सभी सुहृद साहित्य-प्रेमियों को पसंद आएगा। –:
साहित्य जगत संग स्वाधीनता आंदोलन के ऊर्जस्वित उपवन में खिले हुए अदम्य साहसी सुमन/कलिकाओं ने अपनी गुंजायमान होती ध्वनि से चतुर्दिक हाहाकार मचा रखा था किंतु एक पार्श्व ऐसा था जहाँ ऊँचे-नीचे टीलों के अलावा और कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था।आवश्यकता थी एक ऐसे व्यक्तित्व की जो उस पार्श्व को समतल कर उसमें नवीन पुष्पों को आरोपित करे।शीघ्र ही एक ऐसी महान विभूति का प्रादुर्भाव हुआ वे थीं माँ सरस्वती की अमर तनुजा “श्रीमती सरोजिनी नायडू”
जिस प्रकार सूर्य अपने स्वर्णिम आलोक से पृथ्वी के अंधकार को दूर कर देता है ठीक उसी प्रकार आपने अपनी ज्ञान रूपी आभा से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर दिया। “आप उस भ्रामरी के समान हैं जो जीवन रूपी मकरंद तो देती है पर डंक कभी नहीं मारती”
आपका जन्म 13 फरवरी सन 1879 में हैदराबाद के एक बंगाली परिवार में हुआ। आपकी माता श्रीमती सुंदरा देवी जो बांग्ला भाषा की श्रेष्ठ कवयित्री थीं और आपके पिता श्री अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक वैज्ञानिक तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम सदस्य थे। आप अपने भाई- बहनों में अग्रजा थीं। आपके परिवार में विविध कलाओं ने डेरा जमा रखा था। यदि कहा जाए कि कलाकारिता आपके खून में रची बसी थी तो अन्योक्ति न होगी।
आप कुशाग्र बुद्धि विभिन्न भाषाओं की जानकार थीं। आपने 12 वर्ष की अल्पायु में ही मद्रास विश्वविद्यालय से
मैट्रीकुलेशन में शीर्षस्थ हो प्रसिद्धि पाई। यद्यपि आपके पिता आपको गणित और विज्ञान की राह पर ले जाना चाहते थे तथापि आपका रुझान साहित्य की ओर ही था और आपने अपनी उच्च शिक्षा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अधिग्रहण की।
आपका प्रेम विवाह 19 वर्ष की आयु में एक गैर ब्राह्मण जातीय व्यक्ति के साथ, किंतु दोंनो परिवारों की सम्मति एवं शुभाशीषों के छाँव तले हुआ। आप खुशहाल वैवाहिक जीवन तथा चार बच्चों के मातृत्व सुख से लाभान्वित हुईं।
आपने सन उन्नीस सौ पाँच से सन उन्नीस सौ बयालीस तक विभिन्न स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, जैसे कि सन 1905 में बंगाल विभाजन का आंदोलन, सन 1916 मेें बिहार का चंपारण आंदोलन, सन 1917 में महोदया एनी बेसेंट एवं अन्य कुशल नेतृत्व के साथ मिलकर भारतीय महिला संघ की स्थापना करवाना,तत्कालीन महिलाओं को घर की चहारदीवारी से बाहर लाने का श्रेय भी आपको ही जाता है। सन 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक सत्र भी आपकी अध्यक्षता मेें सम्पन्न हुआ। सन 1930 में होने वाले गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी के साथ आपने भागीदारी की।’सविनय अवज्ञा आंदोलन’में भी आपकी महती भूमिका रही,जिसमें आपकी गिरफ़्तारी भी हुई; पुनः सन 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में आपकी पुरजोर भागीदारी एवं 21 माह की कैद आपके स्वाधीनता सेनानी होने का पुरजोर समर्थन करती है।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात आपका सन 1947 से (मृत्यु पूर्व) सन 1949 तक उत्तरप्रदेश के प्रथम राज्यपाल के पद को शोभित करना आपकी राजनैतिक महत्त्व को दर्शाता है।
अन्ततः लखनऊ उत्तरप्रदेश में ही 2 मार्च सन 1949 को हृदयगति रुक जाने के कारण आपका जीवन विरामित हो गया।
प्लेग महामारी में आपके सक्रिय अद्भुत सहयोग के कारण ब्रिटिश सरकार ने आपको ‘कैसर-ए-हिंद’ पदक से सम्मानित किया,जिसे आपने सन 1919 में होने वाले जलियांवाला हत्याकांड के विरोध में सगर्व वापस कर दिया।
आपका साहित्य आज भी विभिन्न उपमानों से शोभित होता हुआ साहित्य जगत में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।
आपने “द लेडी ऑफ द लेक” शीर्षक के अन्तर्गत 1200 पंक्तियों की एक कविता तथा 2000 पंक्तियों का एक नाटक लिखा, जो बहुचर्चित रहा।
सन 1905 में- ‘द गोल्डन थ्रेसहोल्ड’, सन 1912 में ‘द बर्ड ऑफ टाइम’,सन 1917 में ‘द ब्रोकन विंग्स ऑफ लव सांग्स,डेथ एंड द स्प्रिंग, सन 1919 में मुहम्मद जिन्ना- एकता के राजदूत’ एवं सन 1943 में राजदंड बाँसुरी- भारत के गीत आदि पुस्तकें भारतीय साहित्य को प्रदान कीं।
आप की महान उपलब्धियों और योगदान के कारण ही आज की तारीख आपको स्वतन्त्रता सेनानी के साथ-साथ एक महान साहित्यकार एवं दृढ़ विचारों वाली सशक्त महिला के रूप में स्मरण करती है।
आपकी मधुर स्वर लहरी तथा श्रेष्ठ वक्तृत्व कला आपको ‘भारत कोकिला’ व ‘भारत की बुलबुल’ जैसे उपनाम दिलाती है।
आज ऐसी महामना भारतीय नारी को विशेषतः स्मरण,नमन व वंदन करते हुए समग्र देशवासियों की ओर से असंख्य श्रद्धासुमन समर्पित करती हूँ। 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏
धन्यवाद!
लेखिका-
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक रचना
सर्वाधिकार सुरक्षित।
