लगता है, इक लंबे सफर की शुरुआत है,
जाने कितने पल, कितने लम्हे बाकी है।
रस्ते भर बटोरते रहे बेहिसाब सामान,
जाने कितने ख्वाब,ख्वाहिशें बाकी है।
सफर -ए -ज़िन्दगी में अकेला नहीं मुसाफिर,
आँखों में आँसू,दिल में कुछ अरमान बाकी है।
वो रहे खुशनसीब जिन्हें हासिल है, मंज़िलें
मेरी तकदीर में जाने कितने मक़ाम बाकी है।
अनजाने सफर ने भी सिखाया बहुत कुछ,
सोचूं तो क़्या सोचूं अब और क़्या बाकी है।
शैली भागवत ‘आस ‘
