छोटी सी एक नदी के किनारे,
बसता है मेरा गांव,
अमुवा के नीचे, पीपल की छांव में,
बसता है मेरा गांव।
खेतों को छूती भोर की किरण,
मन में सिहरन भरती शीतल पवन,
चांद के नीचे, तारों की छांव में,
बसता है मेरा गांव।
यहां नहीं भौतिक सुखों का मेला,
फिर भी नहीं है कोई अकेला,
अपनों के बीच, रिश्तो की छांव में,
बसता है मेरा गांव।
सुख-दुख सबके साथ हैं निभते,
रिश्तों की परिभाषा खूब समझते,
अभावों के बीच, सपनों की छांव में,
बसता है मेरा गांव।
स्वरचित रचना
रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
