दूसरें भाग में हम लोगों ने गढ़ लुहार के सामाजिक जीवन के बारे में बातें की हैं । जन्म – मरन ,शादी , प्रतिज्ञा ,उनका इतिहास आदि – आदि । अब आगे की बातें करतें हैं ।
गाड़ियां लुहार का इतिहास जानने के बाद अब आते हैं सीधे मुद्दे पर ।
ये उस वक्त की बात हैं । जब मैं लगभग सौलह या सत्तरह साल की उम्र की थी । हमारे गाँव के बाहर एक खाली पड़े मैदान में गढ़ लोहारों के एक क़बीले ने आकर डेरा डाला था । जैसा की उनका काम होता हैं । गाँव में घूमकर अपने बनाये हुये सामान बेचना । इस बार भी यही हुआ ।
चार- पाँच लड़कियों की टोली गाँव में सामान बेचने आई ।
वैसे तो ये सब लड़कियां ही देखने में आकर्षक रंग – रूप वाली होती हैं । पर उनमें एक लड़की देखने में सबसे अलग थी । पतली सी ,गौरी रंगत ,लम्बा कद ,मोटी -मोटी
आँखे , सतरंगी ओढ़नी ,पचरंगी घाघरा , ऊपर लाल रंग का चोलीनुमा टाइट फीटिंग कुर्ता ,। कानों में झुमके ,नाक में नथनी ।गले में हँसली ,कंठी । हाथ भरकर चूड़ियां ।
पैरो में छन – छन करती पायल । चमड़े की जूती ।लंबे घने केश,माथे पर उड़ती लट , मुखड़े पर ऐसा नूर कि नजर ना ठहर पाये ।
फूलों सी कोमलता , मदहोश करने वाली हँसी । मीठी वाणी । और जब वो अपनी राजस्थानी बोली में चिमटा लो ,कल्छी लो , तसला लो , छालना बनवा लो ,झर बनवा लो ,हंसिया बनवा लो । आवाज देते हुए आती थी ।आदमी तो क्या औरते भी उसकी आवाज पर मुग्ध हो जाया करती । जब भी वो आती उसे जरूर आवाज देकर बुला लेती थी । सारे गाँव के लड़के और तो और आदमी भी कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उसे देखने उनके डेरे पर जाने लगे । अब पूरे गाँव में उसके चर्चे थे । हर किसी की ज़बान पर उसकी सुंदरता का बखान था । सुना तो मैंने भी था ।पर देखा नही था अब तक उसे । क्योकि वो अभी तक हमारे मौहल्ले में नही आई थी । एक दिन इंतजार खत्म हुआ ।और वो हमारे घर आ ही गई । मेरी मम्मी ने मुझें आवाज देकर नीचे बुलाया । मैं सीढ़ियों से पूरी तेजी से दौड़कर नीचे आई । उसे देखा तो देखती ही रह गई ।वाह ।तारीफ किये बिना नही रहा गया । वैसे तो देखने में मैं भी कम सुन्दर नही थी । पर उसमे जो कशिश थी ।उसकी तो बात ही कुछ और थी । अब मैने उससे उसका नाम पूछा । अपना नाम बताया । उसने अपना नाम सरवणी बताया । मम्मी को जो लेना था उन लोगों से ले लिया । और वो लोग चली गई ।अब मैं पूरा दिन उसी के बारे में बातें करती रही । रात में सपनें में भी वो ही दिख रही थीं । कोई इतना खुबसूरत और आकर्षक कैसे हो सकता हैं । एक साथ इतनी खूबियां एक इंसान में कैसे हो सकती है । खैर ।अगर मै लड़का होता तो उससे शादी ही कर लेता । अब वो रोज आने लगी थी । कुछ ना कुछ लेने । वो जो बोलती मैं मम्मी से उसे वो ही देने की जिद करती और दे देती ।वो मुझें लाड़ो कहा करती थी ।
यही नाम रखा था उसने मेरा । हमारे घर के आँगन मे एक अमरूद का पेड़ था । उस पर खूब अमरूद आयें थे । सारी लड़कियां आते ही अमरूद के पेड़ पर चढ़ जाया करती थीं । खूब सारे अमरूद तोड़ लेती थीं । मेरी मम्मी और बाकि लोग मना करते रहते थे पर वो सब मानती कहाँ थी । एक दिन एक लड़की पेड़ से गिर कर जख़्मी हो गई थी ।
जारी हैं ………
नेहा धामा ” विजेता “बागपत , उत्तर प्रदेश
