इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, चाहे वह वानप्रस्थ जीवन जिये या गृहस्थ जीवन जिये।

मनुष्य हमेशा समाज में सम्मान, प्रतिष्ठा और पद के स्वार्थ के वशीभूत रहता है, जिसको पाने लिए वो दिन रात मेहनत करता रहता है।
आज का युवा वर्ग चाहे वो लड़का हो या लड़की, वो बन्धनों से मुक्त जीवन जीना चाहते हैं, वो खुद को किसी भी सामाजिक दायरे में बाँध कर रखना नहीं चाहते हैं।
आज का युवा, विशेषतया जो महानगरों में जॉब कर रहे हैं, उनका रिश्तों के ऊपर से विश्वास धीरे-धीरे खत्म हो रहा है इसलिए लिए उनके आसपास घटित होने वाली घटनाएं और बदलती हुई जीवनशैली जिम्मेदार है।
आज का युवा वर्ग सहजीवन को वरीयता दे, शादी जैसे पवित्र बन्धन में खुद को बाँधना नहीं चाह रहा, जिसके पीछे कई सामाजिक और मानसिक कारण हैं;
भारतीय जीवन शैली पर पाश्चात्य सभ्यता का बढ़ता हुआ प्रभाव,
सामाजिक रिश्तों में खत्म होता विश्वास और अपनत्व,
निजता को वरीयता,
सामाजिक रूढ़िवादिता,
जातिवाद और दहेज़ रूपी कुप्रथा,
खुद को आधुनिक दिखाने की चाह,
मात्र शारीरिक संतुष्टि के लिए,
उन्मुक्त जीवन शैली,
जबावदेही और समर्पण का अभाव,
युवाओं में खत्म होती नैतिकता,
रिश्तों को मात्र स्त्री और पुरूष की दृष्टि से देखना,
संस्कार विहीन जीवन-शैली,
कैरियर, लड़का एवम लड़की दोनों ही जॉब कर रहे हैं, दोनों ही जीवन में शादी रूपी जिम्मेदारी को उठाने में स्वयं को सक्षम महसूस नहीं करते,
और भी ऐसे कई कारण हैं जो आज के युवाओं को सहजीवन के लिए प्रेरित करते हैं।
अगर हम सहजीवन और विवाह पर विचार करेंगे तो पायेंगे कि दोनों ही आज के बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य में सही साबित होते हैं, शादी को हमारे समाज ने एक भार के रूप में बना कर रख दिया है, जिसके चलते ना जाने कितने ही लड़के और लड़कियों का भविष्य धीरे-धीरे गृहस्थी की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाता है, शादी सच में एक बँधन होने के साथ-साथ एक अवरोधक भी है;
दहेज, एक ऐसी कुप्रथा जो एकपक्षीय सुख और दुःख का कारण है,
पत्नी का पति को अपने नियंत्रण में रखने की चाह
मानसिक रूढ़िवादिता
पुरुषों की माँ-बाप और पत्नी के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए मानसिक पीड़ा
बढ़ती हुई मंहगाई, पूरे परिवार का खर्च
पत्नी द्वारा संयुक्त परिवार से निकल कर एकल परिवार के लिए दबाव
शादी के बाद बढ़ती फिजूलखर्ची
बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य की चिन्ता
पुरूष के द्वारा सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक संतुलन बिठाने की कशमकश उसके आंतरिक गुणों को नष्ट कर देती है।
जब शादी करने के बाद एकल परिवार के रूप में जीवन व्यतीत करना है तो सहजीवन और विवाह में क्या अंतर शेष रहा।
सहजीवन के चलते आप अपने माँ-बाप के प्रति पूर्णरूप से समर्पित बने रह सकते हो, जो विवाहित होने के बाद सम्भव नहीं है।
भारतीय जीवन में बढ़ता हुआ मानसिक भ्रष्टाचार, रिश्तों में ख़त्म होता अपनत्व, बढ़ती हुआ व्यभिचारिता, उन्मुक्त जीवन जीने की अभिलाषा, सामाजिक रुढ़िवादिता, निजता की चाह, कैरियर को प्राथमिकता आज के युवाओं को शादी के बन्धन से मुक्त होकर सहजीवन के लिए प्रेरित कर रहीं हैं जोकि आज के बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य की दृष्टि से सही है।
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
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