तकदीर का खेल भी निराला है, 
जो कल तक हमारे कत्ल का ख़ाब देखते थे,
आज हमने उन्हें अपने कदमो में पाया है।।
दूर जाकर भी वो हमसे दूर न जा सके ,
जो नफरत का दावा हमसे बेसुमार करते थे।।
लबों पर शोले है उनके,
मगर आँखो में अब भी,
अहसास दिखाई देता है।।
लम्हो की खता थी,
मुहब्बत मेरी और सजा
सदियो ने पाई थी।।
तेरा मेरे कदमो में होना ,
मुझे कहा सुकून देता है,
आज भी मेरा दिल
तेरी चालबाजी पर रोता है।।
कैसे करूँ रुसवा तुझे,
 मेरा दिल दर्द से भर जाता है,
जब भी सोचती हूँ सज़ा तेरी
मेरी आँख भर आती है।।
,
रुसवा हम आज भी अपनी 
मुहब्बत को न कर पायेंगे
तुझे झुकाने से पहले हम खुद ही मिट जाएंगे।।
देखो न!!
किस्मत ने क्या खेल खेला है,
जिसपर एतबार कभी खुदा से बढ़कर किया था
आज वही मुज़रिम बन मेरे सामने में खड़ा है।।
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