पहले के जमाने में, लड़की वाले पैसे लेते थे।
लड़की के चचेरे भाई ने एक  लड़का पसंद किया।
बहन के लिए लड़की की उम्र दस वर्ष,
लड़के की उम्र उन्नीस वर्ष।
लड़की वाले ने जो पैसे  लिए थे, वो सारे पैसे बारातीयों के स्वागत और शादी के व्यवस्था में खत्म हो गए।
बारात जब दरवाजे पर पहुंची तब सब लोग वर को देखने आए। और सब ने वर की बहुत तारीफ की।
वर के रूप रंग के साथ पर्सनालिटी, उनके कपड़े उनके बात करने के विचार सबको बहुत पसंद आया।
वर की इतनी तारीफ सुनकर कन्या की माँ वर को देखने गयी।
और वर को देखते ही उन्होंने कहा हमें अपनी लड़की की शादी इस लड़के से नहीं करनी।
क्योंकि ये मेरी बेटी की उम्र से दुगुना दिखता है।
सब की बोलती बंद। जो  अब तक वर और वरातीयों से प्रभावित थे।
अचंभित रह गए।
पर लड़की की माँ अपनी बात पर डटी रही, नहीं करनी इस लड़के से शादी हमारी फूल सी कोमल बेटी और शादी उससे दुगुने उम्र के लड़के से कदापि नहीं होने दूंगी।
और लड़की को लेकर कमरे के अंदर जा गेट बंद कर लेती हैं।
सारे गाँव वाले एक एक करके समझाने की कोशिश करते हैं पर वो नहीं मानती।
बहुत ही बडी समस्या आन पड़ी।
वारात वापस करने का मतलब था इज्जत तो जाती ही,साथ में जो पैसे लिए थे लड़की वाले ने वो भी लौटाना पड़ता।
पर पैसे तो खत्म हो गए थे शादी के तैयारी में।
अब करना क्या है। किसी  के समझ से बाहर।
समय था नहीं सोच विचार  करने के लिए।
जो भी करना था बस कुछ घंटों में करना था।
कोई रास्ता नहीं मिलने पर जिन्होंने शादी ठीक कर सारी व्यवस्था की थे शादी के लिए,
अपनी “सात” साल की बहन की शादी उस लड़के से कर दी।
बारात खुशी खुशी दुल्हन को लेकर लौट आयी।
अब चूकि  दुल्हन की उम्र कम थी तो उनकी देख भाल के लिए एक अलग से नौकरानी लगा दी गई।
लड़का खुद सरकारी नौकरी में था। और अमीर परिवार से भी।
दुल्हन का पालन पोषण एक राजकुमारी की तरह होने लगा।
लड़का नोकरी के लिए शहर चला गया।
दुल्हन जेठानी और ननद के देख रेख में पलती रही। लड़का हर वर्ष गर्मीयों के छुट्टी में एक महीने के लिए गाँव आता और दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता बनता गया। और शादी के दस वर्ष बाद,जब दुल्हन सत्रह वर्ष की और लड़का उन्नतीस वर्ष का हुआ।
दुल्हन को समझ आने लगा था या समझा दिया गया था। पति-पत्नी के बीच का रिश्ता।
लड़के ने घर में यह कहकर की, शहर में खाने पीने की दिक्कत है, पत्नी को शहर ले जाने की इजाजत मांगी।
परिवार वालों ने भी इजाजत दे दी।
शादी के बाइस वर्ष बाद वो गाँव वापस आयी।
शहर से पूरे बारह वर्ष बाद।
अपने चार पुत्र और पति के साथ।
चारो पुत्र का लालन-पालन के लिए गाँव वापस आना पड़ा क्योंकि उनके पिता चाहते थे।
पुत्र पढ़ने लिखने के साथ परिवार और समाज, के साथ समय बिताये।
ताकि कल चल कर किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत न हो गाँव में रहने और खेती बाड़ी करने में।
हर तरह से अपने बच्चों को सक्षम करना चाहते थे। चारो पुत्र पढ़ लिखकर एक सरकारी स्कूल में अध्यापक हुए। एक शहर जाकर बैंक में मैनेजर के पद पर कार्यरत हुए।एक बिजनेस करने लगा दूसरे शहर में। एक गाँव में ही खेती बाड़ी करने लगा, और परिवार की देखभाल भी। चार बेटों की माँ चार बहुएं घर ले आयी और ठाठ से जीवन व्यतीत होने लगी।
अब आते हैं वहां जिन्होंने लड़की को लेकर दरवाजा बंद कर लिया या यूं कह सकते हैं भाग्य की दरवाजा बंद कर दिया। 
लड़की की शादी दुगुने उम्र के लड़के से नहीं करायी।
हम ये नहीं कह रहे उन्होंने ग़लत किया।
क्योंकि वो एक माँ थी, और माँ अपने बच्चों के लिए हमेशा सही फैसला करती हैं।
हम भी शायद उसके स्थान पर होते तो शायद वही करते जो उन्होंने किया।
पर यहां भाग्य की बात देखिए। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह अपनी बेटी से दो वर्ष बड़े लड़के से करवाया जो पढ़ा लिखा तो था ही साथ देखने सुनने में और, समृद्ध परिवार से भी था।
उसके पूरी सात संतान ने जन्म लिया पर एक भी जीवित नहीं बचा। 
संतान के मृत्यु के शौक मैं पति की भी मृत्यु हो गयी।
शादी के दस वर्ष के बाद ही वो वैधव्य रूप में जीवन यापन करने लगी।
माँ ने तो अच्छा ही चाहा था। पर भाग्य का फैसला कुछ और ही था।
                                   अम्बिका झा 👏
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