बात बात में कुछ टमाटरों में,
 कल छिड़ गई एक अनचाही बहस
 मैं बड़ा,मैं बड़ा कहकर,
 गए सब एक दूजे पर बरस
 एक-एक कर चारों ओर से,
आने  लगी आवाज़ें
 कुछ यूँ अब सब मिलकर,
असमानता का बजाने लगे बाजे
 कहते हैं छोटे बड़े का भेद,
 ना हमको अब भाए
 कट कर ही ड़लना है सबको,
 फिर काहे इतराए
 छोटे-बड़े का महत्व,
सबका इस दुनिया अपना-अपना है 
 फिर काहे का ताना मारना
 काहे लड़ना सताना है
ऐसा ही करना है तो, छोड़ दो हमको
 अब हम भी हड़ताल पर जाएँगे 
 नहीं बिकेंगे तुम सब के संग
 तुम सबको नाकों चने चबवाएँगे
 जब तुम्हारा बड़ा आकार देखकर
 कुछ ग्राहक भाग जाएँगे
 तुम तभी समझोगे भैया
 जब लोग तुमको,कम-कम  तुलवाएँगे
 कोई ना हमेशा एक जैसे,
 टमाटर घर ले जाता है
 छोटे बड़े सब आकार के टमाटर
यहाँ शहरों में सबको भाता है
 सबके आकार का है अपना महत्व,
 मान लो बात छोटी-सी भैया 
 वरना हम तो चले हैं हड़ताल पर यहाँ 
 तुम मंडी में करना मिलकर अपने जैसो के संग ताता थईया
 स्वरचित मौलिक एवं अप्रकाशित
सुनीता कुमारी अहरी
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