चाहे कुछ भी हो, लेकिन निभाना है रस्म तो।
नाराज कोई नहीं हो, निभाना है रस्म तो।।
होगी बदनामी बहुत और करेंगे बुराई सभी ।
रखना है सिर को ऊंचा, निभाना है रस्म तो।।
चाहे कुछ भी हो—————-।।
छुपाने होंगे तुमको ऑंसू ,गरीबी के।
सहने होंगे तुमको जुल्म, बदनसीबी के।।
चाहे नहीं हो काबिल, तुम इतने।
पाना है यदि पनाह यहाँ, निभाना है रस्म तो।।
चाहे कुछ भी हो—————–।।
माना किसी ने तुम्हारी, कभी नहीं पूछी खबर।
रखा सबने तुमको दूर, की नहीं कभी कदर।।
चाहे छोड़ दिया हो, तुमको यहाँ अकेला सबने।
जीना है यदि तुमको यहाँ, निभाना है रस्म तो।।
चाहे कुछ भी कहो—————।।
रस्म यदि तू आज , यह नहीं निभायेगा।
कभी समाज में तू , प्यार नहीं पायेगा।।
चाहे तेरी जाये जान, रस्मो- रिवाज में।
पाना है इज्ज़त तुमको,निभाना है रस्म तो।।
चाहे कुछ भी कहो—————।।
साहित्यकार एवं शिक्षक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
