अछूत समस्या (अंतिम भाग) – 
लेकिन यह काम इतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक की अछूत कौमें अपने आप को संगठित ना कर लें। हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की मांग करना बहुत आशाजनक संकेत हैं।  या तो संप्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म करो ,नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो । कौनसीलों और असेंबलियों का कर्तव्य है कि वह स्कूल कॉलेज, कुऐ तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता उन्हें दिलाएं। जुबानी तौर पर ही नहीं ,वरन साथ ले जाकर उन्हें कुए पर चढ़ाएं ,उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाएं। लेकिन जिस लेजिसलेटिव में बाल विवाह के विरुद्ध पेश किए बिल तथा मजहब के बहाने हाय तौबा मचाई जाती है, वहाँ वे 
अछूतों  को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकते हैं? 
इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जनप्रतिनिधि हो। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगे। हम तो साफ कहते हैं कि उठो ,अछूत कहलाने वाले असली जन सेवकों तथा भाइयों उठो! अपना इतिहास देखो गुरु गोविंद सिंह की फौज की असली  शक्ति तुम ही थे! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके जिस कारण उनका नाम आज भी जिंदा है। तुम्हारे कुर्बानियां स्वर्णअक्षरों में लिखी हुई है। तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके जिंदगी और संभव बनाकर यह बड़ा भारी एहसान कर रहे हो , उसे हम लोग नहीं समझते। लैंड एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्रित कर के भी जमीन नहीं खरीद सकते। तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस  मेयो मनुष्यों से भी कहती है-  उठो ,अपनी शक्ति पहचानो 
संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश के बिना कुछ भी नहीं मिल सकेगा । (Those who would be free must themselves strike the blow.) स्वतंत्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को यत्न करना चाहिए। इंसान के धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है लेकिन जो उनके मातहत हैं , उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है। कहावत है – ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’। अर्थात संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इनकार करने की जुर्रत नहीं कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुंह की ओर ना ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हे अपना मोहरा बनाना चाहती हैं। यही पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब ठीक हो जाएगा। तुम असली 
सर्वहारा हो…. संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हे कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आंदोलन से क्रांति पैदा कर दो। तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो ,वास्तविक सकती हो। सोए हुए शेरों! उठो और बगावत खड़ी कर दो। 
क्रमशः
 गौरी तिवारी 
भागलपुर बिहार
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