अब न रहे वो,घर के मुखिया,
नहीं रह गया,आपस में प्यार।
जलता था जब,एक ही चूल्हा,
मिल कर करते,सभी थे कार।
बना रसोई में,जब भी है खाना,
एक साथ मिल,बैठ कर खाते।
एकल परिवार,की बात अलग,
बैठ डायनिंग टेबल पे हैं खाते।
चाय पकौड़ी या,कोई पकवान,
दुबला पतला हो,चाहे बलवान।
मिलता सबको,खाया है सबने,
मिल बैठ बनाते,होता आसान।
मिलता सभी को,सब कुछ था,
किसी को कोई,गिला नहीं था।
ऐसा सहशील,संयुक्त रहन था,
बुरा कोई भी, व्यसन नहीं था।
नहीं था ज्यादा,एकल परिवार,
बड़ा सा आँगन,बड़ा परिवार।
आपस में प्रेम,था सच्चा प्यार,
इस लिए चलते,ये थे परिवार।
कभी-2 तो,महिलाएं व बहुयें,
काम से थक हो,जाती थीं चूर।
फिर भी सिकन,नहीं चेहरे पर,
दिलों से कोई भी,रहता न दूर।
किन्तु जरा भी,न कोई शिकवा,
न आपसी कोई, होती तकरार।
एकदूजे के लिए,भरे थे दिल में,
सबके ये सच्चा,निःस्वार्थ प्यार।
छोटे बड़े या,कोई भी हो बच्चा,
मुखिया के दिल में,रहता प्यार।
मनाते थे परिवार,मिलजुल कर,
आता जो खुशियों,का त्यौहार।
परदेशी परिजन,ये घर आते थे,
लेके अपने संग,सबके उपहार।
सुंदर था अच्छा,लगता वो दिन,
मिलके सभी,मनाते थे त्यौहार।
बच्चे ये पाले हैं,ताई,चाची,बुआ,
ताऊ चाचा बाबा,दादी की गोद।
एकल परिवार में,मिलती केवल,
मम्मी पापा भाई,बहन की गोद।
चिंता रहित थे,संयुक्त थे परिवार,
सहन शक्ति थी,एकदूजे से प्यार।
सब कर लेता,एक संयुक्त परिवार,
हाथ बँटाते थे सब,जो होता कार।
आज कम दिखते,संयुक्त परिवार,
रखें प्रेम दिल में,करें सब से प्यार।
छल कपट से,टूटा संयुक्त परिवार,
मुखिया का मान नहीं,हुए बेकार।
अपनी मन मर्जी है,एकल परिवार,
बच्चों को मिल न,पाए ये संस्कार।
दिखे न वो प्रेम,न संयुक्त परिवार।
बढ़ते जा रहे हैं,ये एकल परिवार।
उन्नति प्रगति सदा,ये अच्छी रहती,
समाज में शाख़,इज्जत थी रहती।
प्यार प्रेम की ये, रसधार थी बहती,
दूध दही घी की,नदियाँ थी बहती।
छोड़ें रार यदि कोई,प्रेम बढ़ाएं यार,
एकदूजे को दें इज्जत,व करें प्यार।
नहीं सुरक्षित होतेहैं,एकल परिवार,
अनमोल सदा होते,संयुक्त परिवार।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
