इतना खून खराबा होता है,
दंगा फसाद होता है;
पर कहां नदियों, झीलों ,पर्वतों को कोई फर्क पङता है।
सभी बह रहे अनवरत और स्थिर हैं अपने स्रोत -बिंदू में,
बिना शोर मचाते ,,,अडिग खङे हैं, सृष्टि कर्ता के आभार में!
कोई उठा पटक नहीं, शांत निर्विकार, निरंतर आत्मसात किए
हर जर्रा को जो उनके सानिध्य में है।
एक मौका देते पनपने का! जीवन आनन्द में झूमने का
सृजन का! आत्मा के उल्लास का! स्पंदन का!
प्रकृति के विस्तार का! उद्बोधन का! पारितोष का!
✍️”पाम “
ये झीलें न जाने कितनी गहरी हैं;
आत्मा के चैतन्य सी,,
और पर्वतें खङी हैं ;
चैतन्य के प्रवाह सी!
और नदियां बह रही प्रकृति के उच्छ्वास सी
सजल,मनोरम,निरंतर,उद्गम से दूर रास्ते बनाती,,
सबकुछ आत्मसात करती!
नन्हीं उर्मियों सी नाचती थिरकती,बलखाती,ईतराती
✍️”पाम “
निमग्न है आत्मा के पारितोष में,,,
फिर हम ईंसां क्यूं भटक रहे,,
व्यथित हो,,अपूर्णता में…..
इतना खून खराबा होता है;
दंगा फसाद होता है।
पर कहां नदियों, झीलों, पर्वतों को कोई फर्क पङता है!!
✍️”डाॅ पल्लवीकुमारी”पाम “
अनिसाबाद, पटना,बिहार
