महिला सशक्तिकरण.. बहुत ही लुभावना और मनमोहक शब्द । बेशक महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। नौकरी करने लगी हैं.. कभी कभी कुछेक निर्णय में भी उनकी भागीदारी होने लगी है। लेकिन क्या सारी महिलाएँ इस कसौटी पर खड़ी उतरती हैं। क्या समाज या स्वयं महिलाएँ भी नौकरीपेशा और नौकरी करने वाली नारियों के बीच एक दीवार खड़ी नहीं कर देती हैं। सहानुभूतिवश घरेलू महिलाओं से ये कह दिया जाता है कि अरे आप जो कर रही हैं… वो करना सबसे ज्यादा मुश्किल है। लेकिन क्या सच में ये सशक्तिकरण समाज में है। क्या सच में घरेलू महिला और नौकरीपेशा को एक ही चश्मे से देखा जाता है। क्या किसी बेटी के उच्च पद पर पहुँचने का श्रेय किसी माँ को मिलता है? क्या कभी वो बेटी भी स्वयं ये कहती है कि उसकी माँ का भी पूर्ण सहयोग था? इसके लिए घर के पुरुषों की ही वाहवाही होती है कि उन्होंने अगर “छूट” नहीं दी होती तो ये सम्भव नहीं था। ये देखने से इंकार कर दिया जाता है कि इसमें माँ का मूक समर्थन था। हर तरह से माँ ने सहयोग किया था.. उनका मूक समर्थन ही उनका सहयोग था.. नहीं तो वो भी घरेलू महिला ही होती। 
      महिला सशक्तिकरण सिर्फ पुरूषों के समानान्तर खड़े होने की परिभाषा बन कर उभरा। लेकिन मेरे विचार से ये महिला का स्वयं के साथ खड़े होने की परिभाषा होनी चाहिए थी। इसे एक प्रतियोगिता के रूप में ना ढ़ाल एक महिला को दूसरी का हाथ पकड़ बाधा पार करने और कराने की सशक्त मानसिक क्षमता का परिचायक मानना चाहिए। तभी ईंट, बालू, पत्थर उठाने वाली महिला से लेकर फाइटर प्लेन उड़ाने वाली हर महिला स्वयं को सशक्त कर सकेगी और समझ सकेगी। ये तभी सम्भव है जब महिला सशक्तिकरण प्रतियोगिता ना होकर सामर्थ्य और सहयोग की भाषा बने।
     
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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