एक आदमी की पूरी ज़िंदगी इन तीन चीजों को हासिल करने में निकल जाती है, चाहे वो जरूरत से जुड़ी हो या शानोशौकत से।
वो दिन-रात आने वाले भविष्य को लेकर सुन्दर सपने संजो कर रखता है फिर एक दिन अचानक उसके घर, उसके परिवार, उसके शहर, उसके सपनों पर गोलियां, बम बरसने शुरू हो जाते हैं।
सदियों से मानवता युद्ध पर आँसू बहाती आ रही है, हर युद्ध में ये तो तय है कि मरना तो सिर्फ मानवता को ही है।
आज का स्वार्थी, धूर्त मनुष्य, मनुष्यों को स्वयं की सुरक्षा के नाम पर मार रहा है, धिक्कार है ऐसी सुरक्षात्मक सोच का जो इतनी वीभत्स है।
आज जेहन में बस एक ही सवाल आज रहा है कि स्वयं को मजबूत करने के लिए दूसरे को कमजोर कर देना, दूसरे के अस्तित्व को मिटा देना कहाँ तक उचित है।
आखिर युद्ध क्यों ?
तूने फिर से इस जंग को जायज़ बता दिया
पर उनका क्या जो सोते ही नहीं मरने के डर से।
जला के हस्ती उसकी उसे लावारिस बता दिया
पर उसका क्या जो धुँआ निकला जलते हुए घर से।।
“सभी लोगों को चेतावनी दी जाती है, सभी लोग अपनी-अपनी जरूरतों का सामान लेकर २ घण्टे में शहर को खाली कर दें, दुश्मन सेना कभी भी हवाई हमला कर सकती है”
सेना के जवानों की कई सारी छोटी- छोटी सी टुकड़ियां शहर की हर गली में अनाउंसमेंट करके लोगों को शहर खाली करने के निर्देश दे रही थीं।
वैसे भी अब शहर तो बस नाम का ही शहर बचा था, बाजार बंद, स्कूल बन्द, होटल, सडकें बन्द, घरों के दरवाजे बन्द, बिजली बन्द, लोगों के चेहरे की मुस्कराहट बन्द, खुली हवा में साँस लेना बन्द।
परियों का शहर कहा जाने वाला कीव शहर जो यूक्रेन की राजधानी भी है, जो कभी शाम होते ही रोशनी और रंगीनियों में डूब जाता था, अब शाम होते ही दहशत में डूब जाता है, गलियों में गूँजने वाला संगीत, बम और गोलियों की ख़ौफ़ फैलाती हुई आवाज़ों में बदल चुका था।
शहर की जगमगाती हुई रोशनी को ख़ौफ के अँधेरे साये ने अपने आग़ोश में दबोच लिया था, जिन दुकानों से स्वादिष्ट व्यंजनों की महक मुँह में पानी ले आती थी आज उन्हीं दुकानों से उठती हुई बारूद की दुर्गंध मन में एक भय भर रही है।
चारों तरफ से हरे-भरे पेड़ों से घिरा खूबसूरत शहर कीव, जिसकी सड़कों की रौनक़ कभी देखते ही बनती थी।
जनवरी-फरवरी में बर्फ़ से ढकी सड़कें, कैफे में देर रात तक पार्टियों की रौनक़ किसी के भी मन को मोह लेती थी।
पिछले कुछ दिनों में युद्ध की विभीषिका ने हँसते-खेलते शहर को शमशान सा बना दिया।
“सारी ज़िन्दगी एक घर बनाने में गुज़ार दी, अब लोग अपना ही घर छोड़ कर भाग जाने को बोल रहे हैं, मेरे बच्चों का बचपन, मेरी और नताशा की यादें समायी हैं इस घर में, इन गलियों में, इस शहर में”
घर के ड्राइंग रूम में टँगी अपनी स्वर्गीय पत्नी नताशा की फ़ोटो देख मिस्टर एवहेन भावुक हो उठे, जीवन के हर दुख-सुख, उतार-चढ़ाव में नताशा ने उनका हमेशा भरपूर साथ दिया था।
जब तक वो दोनों साथ रहे, उन्होंने जीवन को जी भर के जिया, नताशा के चले जाने के बाद मिस्टर एवहेन बिल्कुल अकेले से पड़ गए, उन्होंने खुद को खुद में ही कैद कर लिया।
शाम को वो देर रात तक पार्क, सड़कों पर ही घूमते रहते, मिस्टर एवहेन अब जिंदगी के उस पड़ाव से गुज़र रहे थे जहाँ अकेलापन मनुष्य को मृत्यु के सामान प्रतीत होता है ।
नताशा उनकी हर छोटी-छोटी जरूरत का ख्याल रखती थी, घर के कामों और पति की सेवा में पूर्णतया समर्पित बहुत ही सुलझी एवम ईमानदार महिला थी।
मिस्टर एवहेन घर की हर चीज़ में नताशा को महसूस करते हैं, तभी उनके फ़ोन की घण्टी बजी,
“डैड, मैं एंटीन बोल रहा हूँ, आप अभी कहाँ हो, आपको जल्दी से जल्दी घर छोड़ कर शहर से बाहर जाना होगा, हमें २ घण्टे के बाद कीव पर हवाई हमले करने के आदेश मिले हैं”
“तुझे पता है बेटा, इस घर, इस गली, इस पूरे शहर से मेरी कितनी ही यादें जुड़ी हैं, मैं अगर इन यादों को छोड़ के चला भी गया तो जिन्दा नहीं रह पाऊँगा”
“डैड आपको जाना ही होगा, जिद मत करो, प्लीज् आप अभी निकल जाओ”
वो रुंआसा सा होकर बोला।
“आज मुझे अपने घर, अपने शहर को जलाना, तबाह करना है, मुझे माफ़ कर देना डैड”
कहकर वो फूट फूटकर रोने लगा।
“बेटा, जो तुम कर रहे हो वो तुम्हारा कर्तव्य है, कभी-कभी कर्तव्य बलिदान भी माँगता है, ठीक है बेटा, तुम चिन्ता मत करो, मैं अभी निकल जा रहा हूँ, तुम अपना और सबका ख़्याल रखना, लव यू बेटा”
“लव यू डैड, मैं आपसे जल्द ही मिलूँगा”
कहकर एंटीन फ़ोन काट देता है।
६५ वर्षीय मिस्टर एवहेन , शहर के एक जाने-माने वकील हैं, दो बेटे और एक बेटी के पिता हैं।
बड़ा बेटा एंटीन जो बचपन से ही रूस का समर्थक था, वो कॉलेज खत्म करने के बाद रूस चला गया, वहाँ जाकर उंसने रशियन एयरफोर्स जॉइन कर ली लेकिन उंसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे अपनी ही मातृ भूमि यूक्रेन के विरुद्ध एक भीषण युद्ध लड़ना होगा।
मिस्टर एवहेन का छोटा बेटा जॉर्ज, जो पोलैंड की एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब कर रहा है।
सबसे छोटी बेटी एंटीलिया, उसके बड़े बेटे एंटीन के परिवार के साथ रहकर मॉस्को में पढ़ाई कर रही है।
मिस्टर एवहेन के आसपास के लोग पहले ही शहर छोड़ कर चले गये थे, दिन व दिन बढ़ती जीने की मुश्किलें और खाने-पीने की चीज़ो का ना मिलना, किसी नरकीय यातनाओं से कम नहीं था।
सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले खाने के पैकेट में बस एक कप कॉफ़ी बनाने लायक दूध और एक बार खाने के लायक़ खाना मिलता था।
बिजली के आपूर्ति भी धीरे-धीरे मुश्किलें बढ़ा रही थी।
“ये आख़िरी चेतावनी है, आप सभी लोग अपने-अपने घरों को छोड़ दें, हवाई हमला किसी भी समय हो सकता है”
यूक्रेन की सैन्य टुकड़ी की ओर से शहर छोड़ के जाने की अंतिम चेतावनी प्रसारित कर दी गयी।
पूरे शहर में हाहाकार मचा हुआ था, बड़ी-बड़ी इमारतों से उठता हुआ धुँआ, लोग अपनी जरूरत का सामान और बच्चों को लेकर शहर से भाग रहे थे।
मिस्टर एवहेन अपने तीनों बच्चों को एक बहुत ही भावुक संदेश प्रेषित करते हैं, जिसमें एक पिता का स्नेह और सन्तानों के उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं शामिल थीं।
उन्होंने अपना मोबाइल बन्द कर लिया, वो अपनी पत्नी नताशा की फ़ोटो लेकर अपने बेडरूम में चले गए।
लगभग सारा शहर खाली हो चुका था, अब शहर सेना के जवानों के सिवाय, अगर कोई और बचा था वो थे यूक्रेन के लिए मर मिटने वाले लोग।
घर जल रहे थे, दुश्मन सेना शहरों को रौंदती हुई आगे बढ़ रही थी लेकिन इन सब बातों से बहुत दूर निकल चुके मिस्टर एवहेन, नताशा की यादों में खोए हुए, साथ में बीते दिनों को याद कर रहे थे।
मिस्टर एवहेन आज चाह रहे थे कि वो भी उसी दुनियाँ में चले जायें जहाँ उनकी नताशा रहती है, कम से कम मरने के बाद इस तरह घरों को जलते हुए, बच्चों को रोते-बिलखते हुए, लोगों को मरते हुए तो नहीं देख पायेंगे।
कुछ घण्टों के बाद रशियन एयरफोर्स को कीव पर हवाई हमले का आदेश मिल गया।
एंटीन ने अपने पिता की अंतिम लोकेशन चेक की जो उसके घर की आ रही थी लेकिन उनका मोबाइल बन्द था।
एंटीन के चेहरे पर दर्द के अनेक भाव आकर चले गए, आज वो अपने घर, अपनी बचपन की गलियों, अपने स्कूल, अपने मोहल्ले, अपने शहर को तबाह करने और अपने पिता को, उनके सपनों को ख़त्म करने के लिए निकल पड़ा था।
उसे अपने पिता के कहे वो शब्द याद आ गए,
“कभी-कभी कर्तव्य बलिदान भी माँगता है”
अवनेश कुमार गोस्वामी
